श्रॆणी पुरालेख: History

भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जी की पुण्यतिथि पर विशेष

भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जी की पुण्यतिथि पर विशेष

घटना नेपाल की है जब पूर्व प्रधानमंत्री स्मृतिशेष श्री राजीव गांधी जी अपनी पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी जी के साथ नेपाल दौरे पर गए थे। राजीव गांधी जी दर्शन हेतु नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर चले गए। पुजारियों ने राजीव जी व सोनिया जी को देखकर राजीव जी से कहा कि आप तो बाबा पशुपति नाथ जी का दर्शन कर सकते हैं लेकिन सोनिया जी नही क्योकि वे अभी भी हिन्दू नही हुई हैं।राजीव जी को जब पुजारियों ने यह कहा तो वे पशुपति नाथ का दर्शन किये बगैर वापस चले आये। राजीव गांधी जी के इस कार्य को अखबारों ने मजाकिया लहजे में लिखा कि अभी तक तो पतिब्रता स्त्रियां देखी गईं थी पहली बार कोई पत्नीब्रता पति मिला है।

मैं राजीव गांधी जी के उस निर्णय की सराहना करता हूँ जिसमे उन्होंने अपने व अपनी पत्नी के आत्मसम्मान पर धार्मिक पाखंडों को भारी नही होने दिया।वे पत्नी को श्रेष्ठ स्थान देते हुए पशुपति नाथ का दर्शन करना गवारा नही किये और आलोचना एवं उपहास को झेल लिए लेकिन कथित धार्मिक कुव्यवस्थाओं के समक्ष झुके नही। जैसे भारत के प्रथम नागरिक/राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविद जी को ब्रम्हा मन्दिर में उनके दलित होने के नाते जाने नही दिया गया वैसे ही नेपाल की प्रथम महिला/राष्ट्रपति श्रीमती विद्या देवी भंडारी जी को भी नेपाल में मंदिर में भगवान का दर्शन नही करने दिया गया क्योकि वे ब्राह्मण होने के बावजूद विधवा हैं।

ये घटनाएं किसी भी व्यक्ति के आत्मसम्मान को कितना चोटिल करती हैं,यह शायद बयां नही किया जा सकता है। चाहे राजीव जी हों,रामनाथ कोविद जी हों या विद्या देवी भंडारी जी,वे कहें या न कहे लेकिन इस जलालत से वे कितने आहत होंगे,इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। कोई भी व्यक्ति जब आम होता है और उसके साथ इस तरह का व्यवहार होता है तो वह सहज रूप में खुद तक अपमानित महसूस कर इसे पी जाता है लेकिन जब वह आम से खास हो जाता है तो उसके लिए ऐसे अपमानजनक व्यवहार मौत से कम नही लगते होंगे।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी से जब सैकड़ो ब्राह्मणों के पैर धुलवा करके चरणामृत पीलवाया गया होगा तो उन्हें भी लगा होगा कि मेरा राष्ट्रपति होना कायस्थ होने के सामने बौना है और उनका ब्राह्मण होना राष्ट्रपति पद पर कई हजार टन भारी सम्पूर्णानन्द जी की मूर्ति का अनावरण जब जगजीवन राम जी ने कर दिया तो उसे ब्राह्मणों ने गंगाजल व दूध से धुलकर पवित्र किया,अखिलेश यादव जी,मायावती जी व मुलायम सिंह यादव जी द्वारा जिस मुख्यमंत्री आवास में रहा गया था वह भी गंगाजल व गोमूत्र से धुलकर पवित्र किया गया तब नए मुख्यमंत्री जी रहना शुरू किए।यह इस देश की जातिगत हीनता और श्रेष्ठता का निम्नतम से निम्नतम रूप है जिससे उबरना मुश्किल ही नही बल्कि दुरूह और असम्भव है।

बाबा साहब डॉ आंबेडकर जी को पत्नी रमा बाई जी की जिद्द पर पंढरपुर मन्दिर में दर्शन हेतु पँहुचने पर डंडा ले पंडो द्वारा खदेड़ दिया गया,विश्वनाथ मंदिर में समाजवादी नेता राजनारायण जी द्वारा दलित प्रवेश कराने पर डंडों से बुरी तरह से उन्हें पीटा गया और करपात्री जी महाराज द्वारा अलग मूर्ति स्थापित की गई। सांसद/आईएएस/एससी-एसटी आयोग के अध्यक्ष रहे पीएल पुनिया जी को पुरी मन्दिर में घुसने ही नही दिया गया। बिहार के मुख्यमंत्री रहे जीतन राम मांझी जी के साथ भी मन्दिर में ऐसा ही बर्ताव किया गया।

महामहिम रामनाथ कोविद जी के साथ पुष्कर में जो वाकया पेश आया है यदि सचमुच सही है तो निहायत ही शर्मनाक है।माननीय कोविद जी को भी अब स्वतन्त्र हों बैटिंग करनी चाहिए क्योंकि राष्ट्रपति से बड़ा कोई पद नही होता और आप इस पर आसीन हैं।महामहिम कोविद जी अब आपको इतिहास बनाना चाहिए जिसे भारतीय जनमानस हजारो वर्ष तक पढ़े और याद रखे। आप अब किसी के मोहताज नही है सर इसलिए आत्मसम्मान,देश के गौरव,वंचितों के हित व सामाजिक न्याय की मुहिम को तीब्र करना चाहिए।

महामहिम राष्ट्रपति कोविद सर जी! राजीव गांधी जी के बोल्ड निर्णय को उनके न रहने पर भी हम कोड करने को विवश हो गए क्योकि उन्होंने अपने सम्मान पर किसी धार्मिक रूढ़ि को भारी नही पड़ने दिया। आपको भी अब खुलकर सामाजिक विषमताओं पर बोलना व प्रहार करना चाहिए न कि उन्हें आत्मसात कर स्वीकारोक्ति प्रदान करनी चाहिए। या फिर एससी एसटी एक्ट में हुए बदलाव के समय आपने जो चुप्पी साधी थी अब भी वही इरादा है तो फैसला आपका। राजीव गांधी जी पुण्य तिथि पर विशेष।। हमारा अन्य ब्लॉग

919 total views, 3 views today

साम्राज्यवाद

1920 तक इब्न सऊद अरब मरुस्थल का एक छोटा कबीलाई सरदार था, जो बिकने के लिए तैयार था, ईमान जैसी चीज जिसके पास भी न फटकती थी। ब्रिटिश सरकार ने उसको पैसा और हथियार दिए, साथ में TE Lawrence के नेतृत्व में फौजी टुकड़ी; 1922 तक उसे साठ हजार पाउंड सालाना मिलते थे, जिसे चर्चिल ने बढाकर १ लाख पाउंड कराया। चर्चिल ने उसे एक रोल्स रॉयस गाड़ी भी भेंट में दी। चर्चिल की नजर में वह ‘असहिष्णु और खून का प्यासा’ लेकिन ब्रिटिश वफादार था!। इस मदद से उसने जिस इलाके पर कब्ज़ा किया उस देश का नाम ही अपने नाम पर सऊदी अरब रखा और वहाँ के पेट्रोलियम उद्योग को ब्रिटिश-अमेरिकी कंपनियों को सौंप दिया। ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवाद का यह भाड़े का टट्टू आज इस्लाम का सरपरस्त है, जबकि ज्यादातर islamist अमेरिका का गालियाँ देते मिलते हैं!
अब अगर ऐसा खानदान यमन में जनाजे पर बम बरसा कर 150 को मार दे, ISIS जैसी तंजीमों की मदद करे, उत्तर अफ्रीका से लेकर पश्चिम-दक्षिण एशिया तक आतंकवादियों की मदद करे तो उसमें अचम्भा क्या? जिसकी पैदाइश ही इस सड़ांध में से हुई हो, जिसकी नजर में वह अपने और अपने आकाओं के स्वार्थों के लिए किस काम को गिरा हुआ समझे?
अचम्भा इस पर भी मत करिये कि ऐसे ही शुरुआत वाले भारत के नए शासक भी आजकल उसी अमेरिकी-ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के दरबार में हाजिरी लगाने में गर्व महसूस करते हैं, साथ में इनके बड़े सलाहकार अजित डोवाल का बेटा, शौर्य डोवाल, जो संघ के बड़े नेता राममाधव के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाता है, जिसके कार्यक्रमों में खुद मोदी जी और उनके मंत्री लोग इकट्ठा होते हैं, वह साथ में एक कंपनी ZeusCorp का भी पार्टनर है। इस कंपनी के मालिक का नाम है His Highness Prince Mishaal bin Abdullah bin Turki bin Abdulaziz Al-Saud – उसी अल सऊद खानदान के वारिसों में से एक, शायद इब्न सऊद का पोता!
थोड़ा ढूंढिये तो पाएंगे कि दुनिया भर के इन सब गिरोहों के तार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं – इस्लामी, हिंदुत्ववादी, ईसाईयत वाले, यहूदी जियनवादी – और इन सबके ऊपर वरदहस्त मिलेगा, बड़े साम्राज्यवादी गिरोहों, वित्तीय-औद्योगिक कारोबारियों, हथियार व्यापारियों, मीडिया घरानों, आदि का। ऐसे ही गिरोह विभिन्न देशों की आर्थिक नीतियों के पीछे मिलेंगे और यही सारे तनाव-युद्दोन्माद के माहौल के पीछे, मुनाफा कमाते हुए! बाकी सब राष्ट्रवाद, मजहब परस्ती, आदि सिर्फ जनता को मूर्ख बनाकर लूटते रहने का कारोबार है।

-मुकेश त्यागी

साभार अजय कुमार

250 total views, 3 views today

क्यों लेते हैं हिन्दू विवाह में सात फेरे ?

क्यों लेते हैं हिन्दू विवाह में सात फेरे ?
सात फेरे लेने के पीछे का सच

आर्यो में अपनी औरतो को कुछ समय के लिए भाड़े पे देने की प्रथा थी
उदाहरण के लिए माधवी का उल्लेख किया जा सकता है.
राजा ययाति ने अपने गुरु गालव को अपनी पुत्री माधवी भेट में दे दी थी.
गालव ने माधवी को तीन राजाओ अलग अलग समय के लिए भाड़े पर दे दिया.
उसके बाद उसने उसे विवाह रचाने के लिए विस्वामित्र को दे दिया.
वह पुत्र उत्पन होने तक उसके साथ रही.
उसके बाद गालव ने लड़की को वापस लेकर पुनः उसके पिता ययाति को लौटा दिया।

अस्थाई तोर पर स्त्रियो को भाड़े पर देंने की प्रथा के अलावा,आर्यो में एक अन्य प्रथा प्रचलित थी,अर्थात उनमे से सर्वोत्तम पुरुषो को सन्तानोतपति की अनुमति देना।
आर्यो में लोगो का एक वर्ग होता था,जिसे देव कहते थे,जो पद और पराक्रम में श्रेष्ठ माने जाते थे ।

अच्छी सन्तानोतपति के उद्देश्य से आर्य लोग देव वर्ग के किसी भी पुरुष के साथ अपनी स्त्रियो को सम्भोग करने की अनुमति देते थे।

यह प्रथा इतने व्यापक रूप से प्रचलित थी कि देव लोग आर्य स्त्रयो के साथ सम्भोग करना अपना आदेशात्मक अपना अधिकार समजने लगे.

किसी भी आर्य स्त्री का उस समय तक विवाह नही हो सकता था,जब की वो संभोग के साधिकार से तथा देवो के नियंत्रण से मुक्त नही कर दी जाती।
तकनीकी भासा में इसे अवदान कहते है.

लाजहोम अनुश्ठान प्रत्येक हिन्दू विवाह में किया जाता है ,जिसका विवरण आश्वलायन गृह्य सूत्र में मिलता है।
लाजहोम देवो द्वारा आर्य स्त्री को सम्भोग के अधिकार से मुक्त किये जाने का स्मृति चिन्ह है.

लाजहोम मे अवदान एक एशा अनुष्ठान है ,जो देवो के वधु के ऊपर अधिकार के समापन की कीमत करता है।
सत्पपदी सभी हिन्दू विवाहों का सबसे अनिवार्य धर्मानुस्थान है,जिसके बिना हिन्दू विवाहों को कानूनी मान्यता नही मिलती।

सत्पपदी का देवो के सम्भोग के अधिकार से अंगभूत सबन्ध है।

सत्पपदी का अर्थ है, वर के वधु के साथ सात कदम चलना ।

यह क्यो अनिवार्य है ? इसका उत्तर यह के की यदि देव क्षतिपूर्ती से असंतुष्ट हो तो वे सातवे कदम से पहले दुल्हन पर अपना अधिकार जता सकते थे ।

सातवा फेरा लेने के देवो का अधिकार समाप्त जो जाता था और वर वधु को ले जाकर,दोनो पति और पत्नी की तरह रह सकते थे।

इसके बाद देव न कोई अड़चन डाल सकते थे और न ही कोई छेड़खानी कर सकते थे ।

पुस्तक
क्रांति तथा प्रतिक्रांति
खंड-7
प्राचीन शासन प्रणाली:आर्यो की सामाजिक स्थिति
पेज न.20 21
डॉ बी आर आंबेडकर

समाज में व्याप्त कुछ बुराइयों का उल्लेख करने के उद्देश्य से हम जुए की और ध्यान आकृष्ट कर सकते है।
आर्यो में सुरापान की तरह जुआ भी व्यापक रूप से प्रचलित था.

सभी राजा के यहाँ जुआ खेलने के लिए महल के साथ ही एक कक्ष होता था । प्रत्येक राजा जुए के लिए एक विशेषज्ञ को नौकरी पर रखता था, जो खेल में साथ देता था.

सम्राट की सेवा में कंक जैसा जुआ-विशेषज्ञ था । जुआ राजाओं का केवल मनोरंजन का साधन ही नही था ।
वे बड़े-बड़े दांव लगाकर खेलते थे।
वे राज्यो,आश्रितों, रिश्तेदारों, गुलामो आदि को दांव पर लगा देते थे.

राजा नल पुष्कर के साथ जुआ खेलते हुए अपनी हर चीज को दांव पर लगाकर हार गए. केवल उन्होंने स्वयं को और अपनी पत्नी दमयंती को दांव पर नही लगाया.
जुए में हारकर राजा नल को जंगल में जाकर एक भिखारी के रूप में रहना पड़ा।

कुछ ऐसे राजा थे जो दांव लगाने में राजा नल से भी आगे बढ़ गए थे। महाभारत के सभा पर्व से पता चलता है कि पांडव के सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने जुए में अपने छोटे भाइयो को और अपनी पत्नी द्रौपदी सहित सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
जुआ आर्यो के लिए सम्मान का प्रतिक था.

डॉ. बी.आर.अम्बेडकर-
— प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति

यह ब्राह्मणी संस्कृति (दरअसल इसे संस्कृति कहना उचित नही यह विकृति को संस्कृति बनाने का सडयंत्र मात्र है ) है जिसे आज “हिन्दुत्व” के नाम से महिमामंडित करके नौजवान बहुजनो को गुमराह किया जा रहा है.

बुद्ध ने कहा है “जानो” और “जानने” के बाद उसे अपनी तर्क बुद्धि के तराजू में तोलो फिर वे आपके लिए आपके परिवार के लिए आपके समाज और पूरी मानवता के लिए ठीक लगे,

फिर उसे मानो लेकिन बहुजन समाज में व्याप्त ब्राह्मणवाद उसे ऐसा करने में बाधा उत्पन्न करता है,
जो कहता है “जानो” नही सिर्फ “मानो” धर्म की बातों पर सवाल खड़ा करना हिंदुत्व में द्रोह है पाप है यही

अन्धविश्वास उत्पन्न करने का पहला फरमान आज तक बहुजन अपने सिर पर हजारो साल से ढोह रहे है कभी बहुजन महापुरुषों की कथनी करनी पे यकीन नही किया न उन्हें पढ़ा न उन्हें जाना,

ज्ञान प्राप्ति ही इंसान के जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए ऐसा बाबासाहब ने हमे शिखाया है और हम उनकी भक्ति में लीन होकर उन्ही के विचारो के विरुद्ध जाकर अपने लिए दुविधा की खाई खोद रहे है ।

इंद्र ने “कृष्ण” नामक असुर की सभी गर्भवती पत्नियों को मार डाला था.
वे उसकी प्रशंसा करते है, क्योंकि उसने असुरों के सैकड़ों गांवो को नष्ट कर दिया था.

वे उसकी प्रशंसा करते है, क्योंकि उसने लाखो “दस्युओं” को मार डाला था.

वे इस आशा में इंद्र की प्रार्थना करते है ताकि वे “अनार्यो” का और भी विनाश कर सके ।

जिससे वे उन (अनार्यो) की खाद्य-आपूर्ति के साधन और संपदा प्राप्त कर शके.

ऋग्वेद के सूक्त आध्यात्मिक तौर पर उन्नायक होने के बजाय, कुत्सित विचारो तथा कुत्सित प्रयोजनों से भरपूर है।

आर्य-धर्म का सरोकार कभी भी सदाचारी जीवन से नही रहा।

-डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
“प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति”

निलेष राठोड

214 total views, 2 views today