श्रॆणी पुरालेख: Greatest person

बाबा साहब का जीवन संघर्ष

बाबा साहब का जीवन संघर्ष
जब बड़ौदा के महाराज ने बाबा साहब को वजीफा दिया और बाबा साहब विदेश जा कर पढ़ना चाहते तो उनकी पत्नी रमाबाई और 5 बच्चे थे तो देखिए वह किस प्रकार से बाबा साहब अपनी बात रमाबाई के सामने रखते हैं

बाबा साहेब – रमा बड़ौदा के महाराज ने मुझे वजीफा दिया है और मैं विदेश जा कर पढ़ना चाहता हूं लेकिन जब मैं तेरी तरफ मुड़कर देखता हूं तेरे पास 5 बच्चे हैं आमदनी का कोई साधन नहीं है और मैं भी तुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहा हूं क्या ऐसी परिस्थिति में तू मुझे विदेश जाकर पढ़ने की अनुमति देगी

रमाबाई – बाबा साहब यह बात सच है कि मेरे पास 5 बच्चे हैं और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है और आप भी मुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहे हो लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाती हूं आप अपनी इच्छा को पूरी करके आना आप अपनी पढ़ाई को पूरी करके आना इन 5 बच्चों का पेट मैं खुद पाल लूंगी, और जब माता रमाबाई बाबा साहब को भरोसा दिलाती हैं तो बाबासाहब विदेश चले जाते हैं और अपनी पढ़ाई करते हैं और इधर माता रमाबाई अपने 5 बच्चों के पेट को पालने के लिए क्या करती है

माता रमाबाई मुंबई की गलियों से गोबर उठा कर लाती उसके बाद उपले बनाकर मुंबई की गलियों में उपले बेच कर आया करती और उससे जो पैसा आ जाता अपने बच्चों का पेट पालती है
इतना पैसा नहीं आता था कि वह अपने बच्चों की परवरिश कर पाती देखते ही देखते उनका बड़ा बेटा दामोदर बीमार हो गया इलाज के पैसे नहीं थे इलाज नहीं करवाया और दामोदर इस दुनिया को छोड़ कर चला गया यह बात माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई

(बाबा साहब द्वारा भेजा गया पत्र)

नानकचंद रत्तू खत पढ़ते हुए- बाबा साहब कहते हैं कि रामा मैं यहां अगर एक वक्त का खाना खाता हूं तब भी मेरा काम नहीं चल पा रहा है मैं अपना जीवन बड़ी मुश्किल में व्यतीत कर रहा हूं में अपना सुबह का नाश्ता दोपहर में करता हूं और शाम को मैं पानी पीकर अपना काम चला रहा हूं और मैं जानता हूं कि तेरे सामने भी बहुत विफल परिस्थितियां हैं तेरे पास पांच बच्चे हैं और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है फिर भी अगर हो सके तो कुछ पैसा भिजवा देना

इधर माता रमाबाई ने बड़ी मुश्किल से कुछ पैसा इकट्ठा किया था लेकिन उनकी बेटी इंदु बीमार हो जाती है अब माता रमाबाई के सामने एक बहुत बड़ा सवाल था कि वे उस पैसे से अपनी बेटी का इलाज कराएं या अपने पति को दिए गए वचन को निभाएं लेकिन एक मां ने फैसला किया और वह पैसा बाबा साहब को भेज दिया और इधर उनकी बेटी इंदू ने भी दम तोड़ दिया और यह बात भी माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई और बाबा साहब पढ़ते रहे और कुछ समय के बाद बाबा साहब अपनी पढ़ाई छोड़कर बड़ौदा के महाराज की रियासत में नौकरी करने के लिए आते हैं तो रमाबाई खुश होती है और क्या कहती है

रमाबाई – अब तो मेरा पति डॉक्टर बन के आ रहा है अब मेरा पति नौकरी करेगा तनखा कमा कर लाएगा अब तो अपने बच्चों को मैं भरपेट खाना खिलाऊंगी अब तो मेरी जिंदगी के दिन बदल जाएंगे

बाबा साहब जब दफ्तर में प्रवेश करते हैं

चपरासी – टाट को खींच लेता है और पानी के घड़े को उठाकर अलग रख देता है

बाबा साहब – अरे चपरासी जरा मुझे फाइल तो लाकर देना
चपरासी – फाइल को भी डंडे से उठा कर देता है
बाबा साहब क्या बदतमीजी है यह क्या हो रहा है तू एक चपरासी होकर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है

चपरासी – अंबेडकर तुम पढ़-लिख जरूर गए हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम हमारी बराबरी पर आ गए हो तुम आज भी नीच हो और तुम्हारे साथ में काम करके अपना धर्म नष्ट नहीं कर सकता

बाबा साहब – क्या मतलब मेरे साथ तेरा धर्म कैसे नष्ट हो सकता है और तू जानता है कि मैं तुझे नौकरी से निकाल सकता हूं

चपरासी – अंबेडकर यह बात में अच्छे से जानता हूं और तुम मुझे नौकरी से भले ही निकाल दो लेकिन मैं तुम्हारे साथ रहकर इस दफ्तर में काम नहीं कर सकता

बाबा साहब मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर और अधिक नौकरी नहीं कर सकता

संचालक – बाबा साहब ने 11वें ही दिन अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपने घर के लिए निकलते हैं और बड़ौदा के रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाते हैं वहां उनकी ट्रेन 4 घंटे लेट होती है तो बाबा साहब एक पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं और क्या कहते हैं

बाबा साहब – मैं पहले यह सोचता था कि हमारे लोग मरे पशुओं को उठाते हैं उनकी खाल खींचते हैं और उनका मांस खाते हैं हमारे लोग दूसरों की टट्टी को अपने सर ऊपर उठाकर फेंकने का काम करते हैं मेरे लोग गंदे रहते हैं उनके पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं है और उनके पास पैसा भी नहीं है तो हो सकता है यह लोग हमारे लोगों से इसलिए ऐसा व्यवहार करते हैं हो सकता है यह लोग हमारे लोगों को इसीलिए नीच कहते है लेकिन आज तो मैंने यूरोप के कपड़े पहने हैं अमेरिका और जापान की यूनिवर्सिटियों से शिक्षा प्राप्त की है और एक अधिकारी बनकर मैं यहां आया हूं जब ये मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो जो मेरे समाज के अशिक्षित और अनपढ़ लोग हैं तो ये लोग उनके साथ कैसा व्यवहार करते होंगे (रोते हुए) अगर मैं अपने समाज को इस ग़ुरबत और गुलामी से आजाद नहीं करा पाया तो मैं वापस बड़ौदा लौट कर नहीं आऊंगा और मैं खुद को गोली मार लूंगा

बाबा साहब जब नौकरी छोड़कर अपने घर पहुंचते हैं और यह बात रमाबाई को पता चलती है तो रमाबाई को बहुत दुख होता है

बाबा साहब – रमा मैं नौकरी तो करना चाहता था लेकिन वहां का चपरासी मुझे फाइल डंडे में बांध कर देता पानी के घड़े को उठाकर अलग रख लेता और वहां के लोगों ने भी मुझे मारने की योजना बनाई मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर नौकरी नहीं कर सकता था इसीलिए मैं नौकरी छोड़ कर चला आया

रमाबाई – बाबा साहब आपको जैसा अच्छा लगे आप ऐसा काम करें मैं आपके साथ हूं

फिर बाबा साहब को अपनी अधूरी पढ़ाई और बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर लिए गए संकल्प का ख्याल आता है तो बाबासाहब फिर से विदेश जाकर हम सब की गुलामी का कारण जो हिंदू धर्म के ग्रंथों में लिखा हुआ है उसे खोजते हैं इधर उनका तीसरा बेटा रमेश भी इस दुनिया को छोड़ कर चला जाता है इस प्रकार से बाबा साहब के तीन बच्चे कुर्बान हो जाते हैं और जब बाबा साहब विदेश से लौट कर आते हैं और हमारी गुलामी व नीचता का कारण हमें बताते हैं

बाबा साहब – मैं कड़ी मेहनत और लगन से यह जान पाया हूं कि हमारे समाज के लोगों के साथ जो नीचता भरा और गुलामी का व्यवहार हो रहा है उसका कारण हिंदू धर्म के जो ग्रंथ हैं उनमें लिखा हुआ है और मैं आज यह घोषणा करता हूं कि 25 दिसंबर सन 1927 को पूरी देश के मीडिया को सूचना देकर इस हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सब को आजाद कर दूंगा

संचालक – और बाबा साहब 25 दिसंबर सन 1927 को हजारों लाखों की संख्या में के सामने हिंदू धर्म के ग्रंथों को वह मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सबको हम सबको इस नीचता और जिल्लत भरी जिंदगी से आजाद करते हैं और कहते हैं

25 दिसंबर 1927

बाबा साहब – मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मान सकता जो अमानवीय है और आज के बाद ऐसा कोई भी विधान व कोई भी कानून मेरे समाज के लोगों पर लागू नहीं होगा जो अमानवीय है क्योंकि यह विधान जबरजस्ती हमारे समाज के लोगों पर थोपा गया है

ऐसा कहकर बाबा साहब मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा देते हैं और आप सबको आजाद करा देते हैं उसके बाद बाबा साहब मुंबई की कोर्ट में वकालत करते हैं तो उनका जो चौथा बेटा होता है राजरतन वह बीमार हो जाता है देखिए वह दृश्य

रमाबाई – नानकचंद रत्तू जाओ जल्दी से बाबा साहब को बुलाकर लाओ क्योंकि हमारा जो बेटा है राजरतन वह बहुत बीमार है और वह लंबी लंबी सांसे ले रहा है

नानकचंद रत्तू – बाबा साहब – 2 जल्दी से घर चलिए आपके पुत्र राजरतन तबीयत बहुत खराब है और र माता रमाबाई ने आपके लिए बुलावा भेजा है

संचालक – जैसे ही बाबा साहब दौड़कर घर पहुंचते हैं और राजरतन को गोदी में लेते हैं तो राजरतन भी दम तोड़ता है अपने चौथे बेटे की मौत पर पति के सामने माता रमाबाई क्या कहती हैं

रमाबाई – रोते हुए बाबा साहब बस करो बाबा साहब अब तो बस करो क्योंकि आपके समाज सुधार की लालसा ने और ज्ञान पाने की लालसा ने मेरा पूरा घर उजाड़ के रख दिया है मैंने एक एक करके अपने 4 बच्चों को दफन कर दिया है बाबा साहब अब तो बस करो

बाबा साहब – रमा तू तो मुझे रो करके बता पा रही है मैं तो रो भी नहीं पा रहा हूं मैं तो रोज ऐसे सैकड़ों बच्चों को मरते हुए देखता हूं रमा तू चुप हो जा, रमा तू चुप हो जा

रमाबाई – बाबा साहब मैंने आज तक आपकी हर बात को माना है और इस बात को भी मान लेती हूं और चुप हो जाती हूं लेकिन आप मुझे इतना बता दो कि आप बड़े फक्र से कहते थे कि तेरा बेटा राज रतन देश पर राज करेगा लेकिन अब यह इस दुनिया में नहीं रहा बताओ यह कैसे इस देश पर राज करेगा बाबा साहब मुझे बता दो कि यह कैसे देश पर राज करेगा

बाबा साहब – रमा यह सच है कि तेरा यह पुत्र अब इस दुनिया में नहीं रहा लेकिन मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं और राजरतन के पार्थिव शरीर की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं अपने जीवन में ऐसा काम करके जाऊंगा कि हर रमा की कोख से पैदा हुआ राजरतन और हर मां की कोख से पैदा हुआ बेटा इस देश पर राज करेगा मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं

इतना कहने के बाद बाबा साहब अपनी जेबों में हाथ डालते हैं और राजरतन के कफन के लिए उन की जेब में एक पैसा तक नहीं होता है इस बात को माता रमाबाई जानती है और रमाबाई अपनी साड़ी का दुपट्टा पार कर राजरतन के ऊपर डाल देती है और बाबा साहब को ख्याल आता आता है कि मुझे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाना है और बाबा साहब राजरतन के पार्थिव शरीर को छोड़ घर पर ही छोड़ कर लंदन के लिए निकलते हैं तभी पीछे से उनका भाई दौड़कर आता है और कहता है

भाई – भीम तू पागल हो गया है यह तेरा पुत्र मरा पड़ा है और तुझे विदेश जाने की सूझ रही है तू कैसा बाप है जो अपने पुत्र को इस अवस्था में छोड़कर विदेश जा रहा है और यह समाज क्या कहेगा अपने पुत्र को कंधा देकर उसका अंतिम क्रिया कर्म तो कर ले

बाबा साहब – भाई मैं जानता हूं कि यह मेरा पुत्र मरा पड़ा है लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अगर आज मैं गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन नहीं गया तो गांधी एंड कंपनी के लोग मेरे करोड़ों करोड़ों लोगों को मार डालेंगे के सारे और हक अधिकारों को छीन लेंगे इसलिए मैं एक पुत्र की खातिर अपने करोड़ों करोड़ों लोगों को बलि चढ़ते हुए नहीं देख सकता यहां तुम सब लोग हो तुम सब संभाल लोगे

ऐसा कहते हुए बाबा साहब गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन चले जाते हैं और आज आपके जो बच्चे हैं आपका जो समाज है जो हक और अधिकार लेकर जी रहा है अपने बच्चों को अच्छे अच्छे कपड़े अच्छी अच्छी शिक्षा और नौकरियों में भेज रहा है इसका श्रेय केवल और केवल बाबा साहब को जाता है और आपके जो लोग हैं वह इस बात को अपने बच्चों को बताने तक शर्माते हैं ।

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यदि कोई इच्छा है तो कोई भी बढ़ सकता है, लेकिन खुद को एक बच्चे के रूप से उभारने में सक्षम हो, जब कोई आपके खिलाफ साजिश कर रहा हो, शायद तब उसे एक महान दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है।

उनकी जाति, वित्तीय स्थिति, अस्पृश्य के रूप में अपमानित, अकेले बैठने और स्कूल में पानी से इनकार करने के लिए, संस्कृत सीखने की अनुमति नहीं दी गई, जल निकासी में फेंक दिया गया, राजा से एक छात्रवृत्ति प्राप्त करने में कामयाब रहा। रहने के लिए घर नहीं मिल सका, अस्पृश्यों के उत्थान के लिए अपने बच्चों के कल्याण का त्याग किया।

वह पूरी रात निर्विवाद अध्ययन किये जाता था। वह 17 भाषाओं को जानता था। पूरी दुनिया के साहित्य को पढ़ा । यहां तक ​​कि दूसरा सबसे ज्यादा ज्ञानी व्यक्ति भी उसका आधा हिस्सा होगा।

जो लोग उसके बारे में पढ़ चुके थे, वे शर्त लगा सकते हैं कि भविष्य में कोई भी उनके कद का नहीं होगा।

संविधान बनाना सरल दिमाग का काम नहीं है। लेकिन साधारण आदमी इसे अपने दिमाग की शक्ति के माध्यम से बना सकता है। डॉ बी आर अम्बेडकर ने भारत के लिए यह किया था।

डॉ अम्बेडकर अनुसूचित जाति के थे। उन्हें कभी भी अध्ययन करने या यहां तक ​​कि एक सामान्य इंसान के रूप में अध्ययन करने का अधिकार नहीं दिया गया था। उन्होंने बचे हुए खाए जो भोजन के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं होंगे। और फिर भी वह दिन में 18-20 घण्टे अध्ययन करने में कामयाब रहे। अपने दृढ़ संकल्प के साथ, डॉ अम्बेडकर ने लगभग 6 शैक्षिक खिताब हासिल किए हैं, जिन्हें आज भी, सभी सुविधाओं के साथ भी नहीं कर सकते हैं। उन्होंने पिछड़े वर्ग के अन्य लोगों के लिए एक अच्छा जीवन की सुविधा के लिए अपनी शैक्षणिक शक्ति का उपयोग किया। पिछड़े वर्गों के लिए प्रावधान होने तक उन्होंने लड़ा। वह नहीं चाहते थे कि वे अपने मानवाधिकारों से वंचित रहें। उन्होंने दूसरों के लिए बेहतर भविष्य बनाने के लिए सबसे बुरे मानवीय उपचारों के माध्यम से लड़ा .बेडकर भारत के अस्पृश्यों का आधुनिक देवता है। उन्होंने भारत के हर इंसानों के लिए समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे और न्याय स्थापित करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया। भारतीय संविधान में उनके द्वारा जीवन के इस महान सिद्धांतों की स्थापना पहले से ही की जा चुकी है। उन्हें भारतीय संविधान के जनक के रूप में जाना जाता है। लेकिन यह कहना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस तरह के महान भारतीय गुणों और मिशन को भारतीयों के बीच छुपा और गलत समझा गया है। मेरा मानना ​​है कि एक दिन वह निश्चित रूप से एक सूर्य की तरह चमक जाएगा। बादल लंबे समय तक सूर्य को कवर कर सकते हैं लेकिन हमेशा के लिए नहीं।

एक बहुमुखी व्यक्तित्व, मानव अधिकारों का एक चैंपियन, एक युग निर्माता, एक वकील, संवैधानिक, राजनेता, मानवविज्ञानी, राजनयिक, शिक्षक, इतिहासकार, महिला अधिकारों का एक चैंपियन, एक तर्कसंगत, ईमानदारी या चरित्र के संबंध में किसी भी निशान से मुक्त , एक शानदार लेखक, अर्थशास्त्री, एक दूरदर्शी Iconoclast, कई डॉक्टरेट्स के साथ अग्रणी विश्वविद्यालयों से बेहद शिक्षित, एक महान और भयानक विद्वान, अकेले ही लाखों लोगों के पक्ष में घटनाओं के पाठ्यक्रम को बदल दिया है, बिना किसी रक्तपात या हिंसा का सहारा लेना, हमेशा कानून के मानकों के भीतर अपनी क्रांति को बनाए रखा, लोकतांत्रिक साधनों में बहुत भरोसा रखते हुए, आर्थिक या राजनीतिक स्वतंत्रता से पहले सामाजिक ईकालिटी के प्रमुख महत्व पर जोर दिया, हमेशा के लिए सबसे महान व्यक्तित्व, हमेशा प्रासंगिक, अपने समय से बहुत दूर, हर व्यक्ति मानव गरिमा के लिए डॉ बीआर अम्बेडकर के बड़े पैमाने पर मानवता के बेजोड़ योगदान को स्वीकार करना चाहिए।

डॉ अम्बेडकर अब तक का सबसे महान और सबसे बुद्धिमान इंसान है। उन्होंने समानता और शिक्षा का सम्मान किया और किसी से भी ज्यादा विश्वास किया। भारत और उनकी निःस्वार्थ सेवा के कारण, पूरी दुनिया भारत को सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश के रूप में देख रही है। और केवल उनके कारण, लाखों लोग जिन्हें जातिवाद द्वारा दास बना दिया गया था, अब शिक्षा हो सकती है।

वह सच्चाई, समानता के लिए एक व्यक्ति सेना थी। वह दासों को मुक्त करने के लिए लड़ रहा था।
निराशाजनक समुदाय (अस्पृश्य) के लिए लड़ने के लिए भारत में पहले व्यक्ति डॉ बीआर अम्बेडकर, वह वह व्यक्ति हैं जो अस्पृश्यों के अधिकारों को मनुष्यों की तरह रहने के अधिकार देते हैं जिन्हें ऊपरी वर्ग समुदाय द्वारा उनकी अनुमति नहीं थी, वह पहले भारतीय हैं महिलाओं के समान अधिकार दें, जिन्हें पुरुषों के एक साल्वे के रूप में अपने जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया था।
महिलाओं के अधिकारों के लिए इस्तीफा देने वाले पहले भारतीय केंद्रीय मंत्री।
वह वह व्यक्ति है जो मनु संस्कृति के खिलाफ लड़ता है जो कहता है कि महिलाएं नरक का सबसे गंदे दरवाजे हैं जिनमें माता हैं और उन्हें एक साल्वे के रूप में माना जाना चाहिए, उन्हें सती जाना चाहिए (अपने पति की शव के साथ खुद को जलाएं), कोई अपनी महिलाओं को एक के रूप में रख सकता है अपने ऋण के लिए व्यक्ति को मार्ज्यूज, महिलाओं को सिर्फ खाना बनाने और अपने रिश्तेदारों को जन्म देने के लिए पैदा किया जाता है,
उसे बात करने या अपने जीवन का फैसला करने की अनुमति नहीं है, वह तलाक या पुनर्विवाह नहीं कर सकती है। वह मनु (मनु समृद्धि) की किताब को जलाने वाला पहला भारतीय था। वह पानी के लिए सत्याग्रह करने वाले पहले भारतीय हैं।

वह वह व्यक्ति थे जो समाज के सबसे निचले स्तर से उठे थे, अस्पृश्यता के संकट सहित सभी बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिसमें कोई और भी साहसपूर्वक सभी परिणामकारी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता था और कभी भी अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकता था। भारत के कमजोर लोगों, महिला, आबादी, श्रम और गरीब वर्गों और राष्ट्रों के लिए उनका सबसे बड़ा योगदान अभी तक पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। राष्ट्र निर्माण, संविधान तैयार करने, भविष्य के लिए उनकी दृष्टि और बीमार भारत के लिए विभिन्न प्रकार के मोर्चे पर उपचार उनकी भूमिकाओं को जाति, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र, धर्म की भूमिका जैसे विषयों पर उनके विभिन्न लेखों / भाषणों में निहित के रूप में निर्धारित किया गया है। यानि वास्तव में लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और तर्कसंगत सोच विकसित करने में बौद्ध धर्म भी एक वैज्ञानिक गुस्सा पैदा करने के लिए भारत को अभी भी महसूस किया जा रहा है। अगर भारत सबसे जातिवादी देश नहीं होता, तो डॉ बी आर अम्बेडकर निश्चित रूप से भारत में सबसे महान व्यक्तित्वों में से एक के रूप में पहचाने जाते ।

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भीड़ मर गयी गैलीलियों नहीं मरा

हम सब को बहुत गुस्सा आता है जब हम पढते हैं कि किस तरह क्रूर ईसाई धर्मान्धों ने गैलीलियो को जिंदा जला दिया था. गैलीलियो का गुनाह क्या था ?

उसने सच बोला था .उसने कहा था कि सूर्य पृथ्वी के चारों तरफ नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ घूमती है .जबकि धर्मग्रन्थ में लिखा था कि पृथ्वी केन्द्र में है और सूर्य तथा अन्य गृह उसके चारों तरफ घुमते हैं .
गैलीलियो ने जो बोला वो सच था .

धर्मग्रन्थ में झूठ लिखा था . इसलिए धर्मग्रंथ को ही सच मानने वाले सारे अंधे गैलीलियो के विरुद्ध हो गये . गैलीलियो को पकड़ कर मुकदमा चलाया गया .अदालत ने सत्य को अपने फैसले का आधार नहीं बनाया अदालत भीड़ से डर गयी . भीड़ ने कहा यह हमारे धर्म के खिलाफ बोलता है इसे जिंदा जला दो . अदालत ने फ़ैसला दिया इसे ज़िंदा जला दो क्योंकी इसने लोगों की धार्मिक आस्था के खिलाफ बोला है . सत्य हार गया आस्था जीत गयी .जिंदा जला दिया गया गैलीलियो , सत्य बोलने के कारण .

आज भी जब हम ये पढते हैं तो सोचते हैं कि काश तब हम जैसे समझदार लोग होते तो ऐसा गलत काम न होने देते. लेकिन अगर मैं आपको बताऊँ कि ऐसा आज भी हो रहा और आप इसे होते हुए चुपचाप देख भी रहे हैं तो भी क्या आप में इसका विरोध करने का साहस है ?

आप अपनी तो छोडिये इस देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी ये साहस नहीं है न्यायालय के एक नहीं अनेकों निर्णय ऐसे हैं जो सत्य के आधार पर नहीं धर्मान्ध भीड़ को खुश करने के लिए दिये गये हैं ।

पहला उदाहरण है अमरनाथ के बर्फ के पिंड को शिवलिंग मानने के बारे में स्वामी अग्निवेश के बयान पर उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की फटकार दो-दो जिला अदालतों द्वारा अग्निवेश के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिये गये .वो बेचारे ज़मानत के लिए भटकते घूमे स्वामी अग्निवेश ने कौन सी झूठी बात कही भाई क्या ये विज्ञान सम्मत बात नहीं है कि उस तापमान पर अगर पानी टपकेगा तो पिंड के रूप में जम ही जायेगा

अगर डरे हुए करोडों लोग उस पिंड को भगवान मानते है तो इससे विज्ञान अपना सिद्धांत तो नहीं बदल देगा ! या तो बदल दो बच्चों की विज्ञान की किताबे या फिर कहने दो किसी को भी सच बात उन्हें इस सच को कहने के लिए पीटा गया उनकी गर्दन काट कर लाने के लिए एक धार्मिक संगठन ने दस लाख के नगद इनाम की घोषणा कर दी .

कोई राजनैतिक पार्टी इस बात के लिए नहीं बोली सबको इन्ही धर्मान्धों के वोट चाहिए सबसे ज्यादा गुस्से की बात ये है कि इसी युग में, इसी साल इसी मामले पर इसी देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वामी अग्निवेश को फटकार लगाईं .

भयंकर स्थिति है सच नहीं बोला जा सकता विज्ञान बढ़ रहा है विज्ञान का उपयोग हथियार बनाने में हो रहा है विज्ञान की खोज, टीवी का इस्तेमाल लोगों के दिमाग बंद करने में किया जा रहा है लोगों को भीड़ में बदला जा रहा है भीड़ की मानसिकता को एक जैसा बनाया जा रहा है जो अलग तरह से बोले उसे मारो या जेल में डाल दो अलग बात बोलने वाला अपराधी है !सच बोलने वाला अपराधी है .

ये मस्जिदें तोड़ने वाली भीड़ ये दलितों की बस्तियां जला देने वाली भीड़ ये आदिवासियों को नक्सली कह कर उनका दमन कर उनकी ज़मीने छीनने वाली भीड़ जो दंतेवाड़ा से अयोध्या तक फ़ैली है , वही भीड़ संसद में दाखिल हो गयी है वो कुर्सियों पर बैठ गयी है वो सोनी सोरी मामले में अत्याचारी पुलिस का साथ दे रही है !वो गुजरात में मोदी का साथ दे रही है वो तर्क को नहीं मानेगी , इतिहास को नहीं मानेगी ।

ये भीड़ राजनीति को चलाएगी विज्ञान को जूतों तले रोंद देगी कमजोरों को मार देगी और फिर ढोंग करके खुद को धर्मिक , राष्ट्रभक्त और मुख्यधारा कहेगी ।

मैं करन वर्मा खुद को इस भीड़ के राष्ट्रवाद , धर्म और राजनीति से अलग करता हूं मुझे इसके खतरे पता हैं पर मैंने इतिहास में जाकर जलते हुए गैलीलियो के साथ खड़े होने का फ़ैसला किया है मुझे पता है मेरा अंत उससे ज्यादा बुरा हो सकता है पर देखो न भीड़ मर गयी गैलीलियो नहीं मरा ।

जागो और जगाओ मनुवाद व अन्धविश्वास दूर भगाओ ।

जय भीम नमो बुद्धाय
करन वर्मा
इटावा (उ0प्र0)
मो0 – 9410045781

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