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डायनासोर का अंत और मानवों की उत्पत्ति

डायनासोर का अंत और मानवों की उत्पत्ति

आज से लगभग 6.5 करोड़ साल पहले एक बहुत बड़ी धुमकेतू के पृथ्वी पर गिरने से डायनासोर के सम्पूर्ण प्रजातियों का विनाश हो गया।

एक बहुत बड़े उल्कापिंड पृथ्वी से टकराया यह विस्फोट इतना शक्तिशाल था कि पृथ्वी से लाखों किल्लो टन धुल अंतरिक्ष में चला गया इस प्रकार से पृथ्वी के आकाश में कई दिनों तक धुल के बादल बन गए जिसकी वजह से पृथ्वी पर धुप आना नामुमकिन था।
प्रकाश नहीं आने के कारण करीब 75% पेड़ पौधे, जीव जंतु विनाश हो गए।

और टक्कर के बाद समंदर में सुनामी आने लगी और सभी तरफ तबाही शुरू हो गई इस विस्फोट में समुंदर का बहुत सारे जल बाप बन गया इस गर्मी के कारण जमीन पर रहने वाले सभी बड़े बड़े पेड़ पौधे, जीव जंतु जल गए। इस तरह डायनासोर का अंत हो गया।

सौभाग्य उस समय जमीन के अंदर बिलों में रहने वाले हमारे पूर्वज स्तनधारी जीव बच गए।
उस समय स्तनधारी जिव डायनासोरस से डर की वजह से ज़मीन में छुपकर रहते थे।
और इनकी यही खासियत इनके लिए वरदान साबित हुई जब यह जिव आराम से अपना जीवन धरती के अंदर बिता रहे थे।
हमारे पुर्वज चूहों जैसे दिखने वाले आज हम इन्हें मेमल्स कहते हैं।

मेमल्स जिनको हम अपने पूर्वज मानते हैं।
जमीन के नीचे छिपने के कारण जिंदा रहे लाखों साल बितने के बाद पृथ्वी के वातावरण धीरे धीरे समान्य हुए।इस समय पृथ्वी पर बड़े बड़े पेड़ पौधे विकसित होने लगे
और मेमल्स को प्रयाप्त मात्रा में भोजन मिलने लगा
जिसके कारण 6 करोड़ साल पहले हमारे पूर्वज धीरे धीरे बढ़ने लगे इस समय पृथ्वी पर मेमल्स का वर्चस्व था।

लगभग 5.6 करोड़ साल पहले वातावरण और समय बितने के साथ साथ हमारे पूर्वजों में बदलाव होते चले गए।
पहले से ज्यादा बड़े और फुर्तीले हो गए, तथा प्रयाप्त मात्रा में पेड़ों पर भोजन मिलने के कारण हमारे पूर्वज पेड़ों पर रहने लगे।

पेड़ों पर रहने के कारण उनमें बदलाव होने लगे
मेमल्स के शरीर पहले से ज्यादा लम्बा हो गया।
हाथ और पैर बढ़ने लगा इस समय हमारे पूर्वज बंदरों जैसे दिखाई देने लगे।

लगभग 5.5 करोड़ साल पहले पृथ्वी के मौसम में फिर से बदलाव होने लगे तापमान बढ़ने के कारण पेड़ों की संख्या कम होने लगा। पेड़ों पर भोजन की कमी होने के कारण
मेमल्स को पेड़ों पर भोजन मिलने में कठिनाई होने लगे।

लगभग 4.2 करोड़ साल पहले हमारे पूर्वज ने पेड़ों से नीचे उतर कर भोजन की तलाश करने लगे और जमीन पर भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे।

इसी दौरान हम दो पैरों पर चलने शुरू कर दिये अगले लाखों सालों तक हमारे शरीर में बदलाव होते चले गए।
हम पहले से ज्यादा स्ट्रोंग और फास्ट चलने लगे लगभग 3.2 मिलियन साल पहले Australopithecos का विकास हुआ।
Australopithecos पूरी तरह से दोनों पैरों पर चलते थे। समय के साथ साथ इनके शरीर में बदलाव होते चले गए।

लगभग 2.3 मिलियन साल पहले Homohabilis का विकास हुआ इनको हाइवीमैन भी बोलते हैं।
इनके सिर बहुत बड़े और शरीर भारी हुआ करता था।
Homohabilis प्रजातियों ने दुनिया में सबसे पहले पत्थरों को औजार के रूप में इस्तेमाल किया।
लाखों सालों में हमारे शरीर में बदलाव होते गए और लगभग 1.8 मिलियन साल पहले Homoeractus का विकास हुआ।

Homoeractus अपनी प्रजाति के दुसरे सदस्यों के साथ रहते थे और शिकार करते थे।
जंगल में लगी आग के कारण आग की शक्ति का पता लगा और उन्होंने आग का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
Homoeractus कच्चे मांस को पका कर खाने लगे, लगभग 20 लाख साल पहले Homoeractus ने एक दूसरे से वार्तालाप करना सीख लिया था।

लगभग 2 लाख साल पहले इस समय हमारा शरीर Homosapien में बदल चुका था।
इसी समय हम पृथ्वी में सबसे ज्यादा समझदार प्राणी थे और पृथ्वी पर बहुत से जगहों पर रहने लगे।

80 हजार साल पहले हम जंगलों में समुह बना कर रहने लगे।
और लगभग 15 हजार साल पहले मनुष्य जीवन की उत्क्रांति होने लगी इस समय मनुष्य भाषा का प्रयोग, खेती के शुरूआत करने लगे।

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देशभक्ति मानसिकता

देशभक्ति मानसिकता की असलियत जरूर पढ़ें
औरत के शरीर की ये जो दो गांठें है ना, ये दरअसल है तो इसलिए ताकि वो अपने बच्चे को दूध पिला सके, एक नयी जिंदगी का सर्जन कर सके, लेकिन यहि गाँठ पुरुषों के दिमाग ट्यूमर है, ये गाँठ ट्यूमर की तरह हर पुरुष के दिमाग में है, फिर वो पुरुष चाहे ट्रेफिक सिग्नल पर भीख माँगता भिखारी हो, अपने एयरकंडीशनर ऑफिस में बैठा बिज़नसमैन हो, सीमा पर खड़ा जवान हो, चाहे देश के सर्वोच्च पद पर बैठा कोई व्यक्ति हो !

कुछ दिन पहले विधा बालन ने सिर्फ इतना कहा था ‘एक आर्मी जवान लगातार मेरे ब्रेस्ट को घूर रहा था’
और भक्त मंडली इसे आर्मी का अपमान बताने लगी !
इसमे आर्मी का अपमान कहाँ हो गया ?

आर्मी में जाने वाले लोग भी इसी विकृत मानसिकता वाले समाज का हिस्सा है और एक आर्मी वाले की मानसिकता एक आम सिविलियन से कहीँ ज्यादा विकृत या यूँ कहे अपोजिट जेंडर को लेकर ज्यादा कुंठित होती है !
इसके लिए भी सरकारी नीतियां हि जिम्मेदार है, एक तो लगातार घर से दूर और विषम परिस्तिथियों में रहते हुऐ आर्मी वाले मानसिक अवसाद का शिकार रहते है, और दूसरा जहाँ भी सैनिको को विशेष अधिकार मिले है वहाँ ये सबको अपना गुलाम समझते है नक्सल प्रभावित इलाके में ये लड़कियों के ब्रेस्ट दबाकर उनमें से दूध निचोड़ कर जाँच करते है की लड़की नक्सली तो नहीँ ! यहाँ आर्मी वालों द्वारा किसी भी महिला का रेप होना बिलकुल सामान्य घटना है बिलकुल ऐसे हि हालात कश्मीर और उत्तरपूर्व में है !
लगातार ऐसे माहौल में रहने की वजह से इनमें से अधिकतर का व्यवहार बिलकुल तानाशाह की तरह हो जाता है !
ऐसा भी नहीँ की सारे सैनिक ऐसे हि होते है, जैसे सारे पुरुष बलात्कारी नहीँ होते, सारे नेता चोर नहीँ होते उसी तरह सारे सैनिक भी ऐसे नहीँ होते ! लेकिन हाँ इतना जरुर है सेक्स को लेकर इनकी मानसिकता आम लोगों से कहीँ ज्यादा विकृत रहती है !
तो सेना का ये महिमामंडन बंद कीजिए, सेना को पूजना और और उसे देश और समाज से ऊपर रखना बंद कीजिए !

सेना में जाने का कारण कोई देशभक्ति नहीं बल्कि बेरोज़गारी के दौर में रोजगार और सेना की सैलरी होती है !
लिखकर रख लीजिए किसीभी आर्मी वाले को किसी दूसरे संस्थान में छोटी नौकरी भी मिल जाये तो वो तुरंत सेना को छोड़ देगा !
फर्जी देशभक्त जो सेना की पूजा करके एक घातक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे है मैं उनको चैलेंज कर
रहा हूँ –
इनमें से कोई भी देशभक्त ट्रेन के किसी ऐसे कम्पार्टमेंट जिसमे छ में से चार सीट पर आर्मी वाले हो उसमे अपनी माँ बहन बेटी के साथ यात्रा करके बताये !
इन लोगों का कभी कभी जंगलों की सेना से सामना नही हुआ, कभी गडचिरोली,अहेरी, बस्तर, लालगढ की सड़कों पर 7 बजे के बाद परिवार के साथ निकलिए, जायका लीजिए कभी सेना की खातिरदारी का !
अगर ये नहीँ कर पाओ तो, राष्ट्रवाद के नाम पर गंध फैलाना बंद कीजिए ! राष्ट्रवाद की ऐसी गंध जिसमें खुदको देशभक्त साबित करने के लिए भी एक महिला का चरित्र हनन करना पड़े ! एक पीढ़ित को हो आरोपी बनाना पड़े !
आप भी इंसान है जानवर नहीँ इसलिए भेड़ बकरियों की तरह आपको संचालित करने वाले चंद गड़रियों के पीछे चलना बंद कीजिए !

नक्सली, आतंकी, पत्थरबाज किसी खेत में नहीं पैदा होते ! ना वो किसी असेम्बली लाइन वाली फैक्ट्री से ‘मॉस प्रोड्यूस’ हो के आते हैं ! सो महान देशभक्तों, सोचो कि ये हजारो लड़के, लडकियाँ, महिला, पुरुष हथियार लेके अपनी भी जान दांव पर लगा के यूं ही नहीं कूद पड़ते !

वो आते है क्योंकि तुम्हारी सेना अम्बानी, अडाणी जैसो के आदेश पर सरकार की और से, सरकारी आतंकी के तौर पर काम करती है ! उनकी लड़कियों और महिलाओं को सेक्स स्लेव समझती है और पुरूषों को गुलाम !
कभी सोचा है, क्यूं आदिवासी महिलाएँ आर्मी मुख्यालय के आगे नग्न होकर प्रदर्शन करती है और कहती है रेप अस ?
कभी सोचा है आर्मी वालों की हत्या के बाद महिला नक्सली घृणा से क्यूँ उनके लिंग काट देती है ?
कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़, झारखंड, असम जहाँ कहीं भी सेना को विशेषाधिकार मिले वहाँ हर घर में एक सोनी सोरी एक मकड़म हिड़मे मिलेगी !

अभी मेजर गोगोई के बचाव में खड़े हो, कौन है गोगोई ?
वहि न जिसने एक नाबालिग लड़की के बड़े भाई को आतंकी बताकर तड़पा तड़पाकर मार दिया और अपने छोटे भाई को बचाने के लिए उस नाबालिग लड़की को गोगोई के साथ होटल में आने को मजबूर होना पड़ा ! वही गोगोई जो आधी रात को जाँच के बहाने किसीके घर में भी घुस जाता है !

अन्याय की पराकाष्ठा और न्याय की कीमत चुकाने में असमर्थता से उपजी असहाय स्थिति के गर्भ में पलकर नक्सलियों और पत्थरबाजो की पैदाइश हुई है !
ये सब देख कर क्या एक कुढ़न पैदा नहीं होती ?
अगर आपमे इंसानियत जिंदा होती तो समझते की ऐसी स्तिथि में जिंदगी बोझ लगने लगती है और अपनी असहाय स्थिति का कोफ़्त भरा एहसास होता है !
ये घुटन, अत्याचार और फिर जीने के लिए गिड़गिड़ाना…
उनकी विनती कोई सुनता नहीं, न्याय
के लिए पैसे नहीं, इस सबसे घृणा पैदा होती है और उस घृणा से नक्सलियों, आतंकियों और पत्थरबाजो की पैदाइश !

अगर इस देश को बचाना है और देश को बचाने से भी बढ़कर यदि आपमे इंसानियत जिंदा है तो, सेना का महिमामंडन बंद कीजिए और हर गोगोई के विरोध में खड़े होइये !

…. बाकी मुझे देशद्रोही का सर्टिफिकेट देना चाहो तो….. गो टू हेल…. मुझे तुम्हारे सर्टिफिकेट की जरुरत नहीँ !

Girraj Ved, mamta joshi

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निपाह, जानिये इस तेजी से बढ़ते वायरस के बारे में

निपाह, जानिये इस तेजी से बढ़ते वायरस के बारे में

एनआईवी की पहली बार 1998 में मलेशिया के कंपंग सुंगई निपाह में हुई बीमारी के फैलने के दौरान पहचाना गया था। इस अवसर पर, सूअर मध्यवर्ती मेजबान थे। हालांकि, बाद में एनवी प्रकोप में, कोई मध्यवर्ती मेजबान नहीं थे। 2004 में बांग्लादेश में, संक्रमित फल चमगादड़ से दूषित होने वाली हथेली के साबुन के परिणामस्वरूप मनुष्य एनआईवी से संक्रमित हो गए। भारत में अस्पताल की स्थापना सहित मानव-से-मानव संचरण भी दस्तावेज किया गया है। निपाह वायरस (एनआईवी) संक्रमण एक नया उभरता हुआ ज़ूनोसिस है जो जानवरों और मनुष्यों दोनों में गंभीर बीमारी का कारण बनता है। वायरस का प्राकृतिक मेजबान पटरोपोडिडे परिवार, पतरोपस जीनस के फल चमगादड़ हैं।

इंसानों में एनवी संक्रमण में एसिम्प्टोमैटिक संक्रमण से तीव्र श्वसन सिंड्रोम और घातक एन्सेफलाइटिस से नैदानिक ​​प्रस्तुतियों की एक श्रृंखला होती है। एनआईवी सूअरों और अन्य घरेलू जानवरों में बीमारी पैदा करने में भी सक्षम है। मनुष्यों या जानवरों के लिए कोई टीका नहीं है। मानव मामलों के लिए प्राथमिक उपचार गहन सहायक देखभाल है।
Information resources
Hendra virus web site

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