श्रॆणी पुरालेख: रोचक

रामायण को एक वाल्मीकि की चुनौती

रामायण को एक वाल्मीकि की चुनौती
सिद्ध करो राम था….
या स्विकार करो कि रामायण काल्पनिक ग्रंथ है……

एक समय पर दो तरह के इंसान कैसे हो सकते हैं?
एक पूंछ वाला और एक बिना पूंछ वाला दोनों मनुष्य की तरह बोलते हैं दोनों के पिता राजा हैं क्या ऐसा संभव है??

मेंढक से मंदोदरी कैसे बन सकती हैं/ पैदा हो सकती है??
लंगोटी का दाग छुड़ाने से अंगद कैसे पैदा हो सकता है??
पक्षी मनुष्य की तरह कैसे काम कर सकता है जैसे गिद्धराज??
किसी मनुष्य के 10 सिर हो ही नहीं सकते इतिहास या पुरातत्व द्वारा आज तक ये सिद्ध नहीं हो पाया कि किसी इंसान के 10 सिर 20 भुजाओं वाला कोई संतान नहीं है…….

जिस लंका की आप बात कर रहे हो वह लंका 1972 में की लंका नाम पड़ा इसके पहले सिलोन से पहले सिहाली इत्यादि नाम थे तो असली लंका कहा है???

घडे से लड़की कैसे पैदा हो सकती है?
एक माह में मकरध्वज कैसे पैदा हुए?
मछली से कोई मनुष्य कैसे पैदा हो सकता है??
एक माह में मकरध्वज पातालपुरी में नौकरी करने लगे क्या ये संभव है?? अगर संभव है तो साबित करो…

5000 साल पुरानी द्रविड़ भाषा को कोई पढ़ नहीं सकता
तो 70000 साल पहले अंगद किस लैंग्वेज भाषा में लिख रहा था??

सम्राट अशोक के काल में अयोध्या का नाम साकेत था
अयोध्या के बाद साकेत और साकेत के बाद अयोध्या नाम कैसे पड़ा??
पुरातत्व विभाग की तरफ से एक भी प्रमाण हो तो बताओ कि राम राज्य था??

सात घोड़ों से सूर्य कैसे चल रहा आप की पुस्तकें कह रही हैं जबकि विज्ञान कह रहा है कि सूर्य चलता ही नहीं है…..
जब राम का राज्याभिषेक हो रहा था तब सूर्य एक महीने के लिए रुक गया था
जबकि सूर्य चलता ही नहीं है अगर सूर्य चलता है तो सिद्ध करो /साबित करो….

सूर्य खाने गए हनुमान की स्पीड और कद क्या था??

बालमीक रामायण कहती है चैत अमावस्या को रावण का वध होता है
तुलसीकृत रामायण कहती है कुमार दशहरा को रावण का वध होता है तो सच क्या है??

सोने की खोज हुए 4000 साल हुए हैं तो 70000 साल पहले सोने की लंका कहां से आई थी??
सोने का महल था या सोने की लंका 6000 साल पूर्व सभी चमड़े का परिधान पहनते थे
तो 70000 साल पूर्व कपड़े राम कहां से पहनते थे??

जब ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण पैदा हुआ तो भारत में ही क्यों पैदा हुआ जबकि ब्रह्मा ने ब्रह्मांड रचाया तो चीन अमेरिका थाईलैंड जापान दक्षिण कोरिया वगैरह वगैरह दुनिया के बाकी देशों में ब्राह्मणों कयो पैदा नहीं हुआ या होता??
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कैलाशनाथ मन्दिर

कैलाशनाथ मन्दिर
200 वर्ष और 10 पीढियां लगी भगवान् शिव को समर्पित इस कैलाशनाथ मंदिर को बनाने में और फिर भी हम ताजमहल को वास्तुकला का नायाब नमूना कहते हैं।

40 हजार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया कैलाश मंदिर के निर्माण में 90 फीट है इस अनूठे मंदिर की ऊंचाई 276 फीट लम्बा , 154 फीट चौड़ा है यह गुफा मंदिर
200 साल लगे इस मंदिर के निर्माण में, दस पीढ़ियां लगीं
7000 शिल्पियों ने लगातार काम करके तैयार किया है ये मंदिर।

एलोरा की 34 गुफाओं में सबसे अदभुत है कैलाश मंदिर गुफा। एलोरा का विशाल कैलाश मंदिर (गुफा 16) के निर्माण का श्रेय राष्ट्रकूट शासक कृष्‍णा- प्रथम (लगभग 757-783 ई ) को जाता है। वह दंतिदुर्ग का उत्‍तराधिकारी एवं चाचा था। हालांकि माना जाता है कि इसका निर्माण कई पीढ़ियों में हुआ है। पर इसका काम कृष्णा प्रथम के शासनकाल में पूरा हुआ।

कैलाश मंदिर में अति विशाल शिवलिंग देखा जा सकता है। मंदिर में एक विशाल हाथी की प्रतिमा भी है जो अब खंडित हो चुकी है। ऐलोरा की ज्यादातर गुफाओ में प्राकृतिक प्रकाश पहुंचता है। लेकिन कुछ गुफाओं को देखने के लिए बैटरी वाले टार्च की जरूरत होती है। यहां पुरातत्व विभाग के कर्मचारी आपकी मदद के लिए मौजूद होते हैं। अजन्‍ता से अलग एलोरा गुफाओं की विशेषता यह है कि अलग अलग ऐतिहासिक कालखंड में व्‍यापार मार्ग के अत्‍यन्‍त निकट होने के कारण इनकी कभी भी उपेक्षा नहीं हुई। इन गुफाओं को देखने के लिए उत्‍साही यात्रियों के साथ-साथ राजसी व्‍यक्ति नियमित रूप से आते रहे।

एलोरा की 16 नंबर गुफा सबसे बड़ी है, जो कैलाश के स्‍वामी भगवान शिव को समर्पित है। इसमें सबसे ज़्यादा खुदाई काम किया गया है। बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को ही तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसकी नक्काशी अत्यंत विशाल और भव्‍य है। विशाल गोपुरम से प्रवेश करते ही सामने खुले मंडप में नंदी की प्रतिमा नजर आती है तो उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी और स्तंभ बने हैं।

एलोरा के वास्तुकारों ने कैलाश मंदिर को हिमालय के कैलाश का रूप देने की कोशिश की है। कैलाश के भैरव की मूर्ति भयकारक दिखाई देती है, पार्वती की मूर्ति स्नेहिल नजर आती है। शिव तो यहां ऐसे वेग में तांडव करते नजर आते हैं जैसा कहीं और दिखाई नहीं देता।

शिव-पार्वती का परिणय भावी चित्रित करने में कलाकारों ने मानो अपनी कल्पनाशीलता का चरमोत्कर्ष देने की कोशिश की है। शिव पार्वती का विवाह, विष्णु का नरसिंहाअवतार, रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाया जाना आदि चित्र यहां दीवारों में उकेरे गए हैं। वास्तव में यह देश के ही सात अजूबों में नहीं बल्कि दुनिया के सात अजूबों में शामिल होने लायक है। उस दौर में जब जेसीबी मशीनें नहीं थी। पत्थरों को काटने के लिए डायनामाइट नहीं थे ये काम कैसे संभव हुआ होगा सोच कर अचरज होता है। कई बार ऐसा लगता है कि ये इन्सान के वश की बात नहीं।

भारतीय पुरातत्व कला का बेमिसाल हस्ताक्षर है यह् कैलाशनाथ मंदिर , संभाजीनगर महाराष्ट्र स्थित इस मंदिर का दृश्य वर्षा ऋतु में अतिमनोहर होता है।

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क्यों लेते हैं हिन्दू विवाह में सात फेरे ?

क्यों लेते हैं हिन्दू विवाह में सात फेरे ?
सात फेरे लेने के पीछे का सच

आर्यो में अपनी औरतो को कुछ समय के लिए भाड़े पे देने की प्रथा थी
उदाहरण के लिए माधवी का उल्लेख किया जा सकता है.
राजा ययाति ने अपने गुरु गालव को अपनी पुत्री माधवी भेट में दे दी थी.
गालव ने माधवी को तीन राजाओ अलग अलग समय के लिए भाड़े पर दे दिया.
उसके बाद उसने उसे विवाह रचाने के लिए विस्वामित्र को दे दिया.
वह पुत्र उत्पन होने तक उसके साथ रही.
उसके बाद गालव ने लड़की को वापस लेकर पुनः उसके पिता ययाति को लौटा दिया।

अस्थाई तोर पर स्त्रियो को भाड़े पर देंने की प्रथा के अलावा,आर्यो में एक अन्य प्रथा प्रचलित थी,अर्थात उनमे से सर्वोत्तम पुरुषो को सन्तानोतपति की अनुमति देना।
आर्यो में लोगो का एक वर्ग होता था,जिसे देव कहते थे,जो पद और पराक्रम में श्रेष्ठ माने जाते थे ।

अच्छी सन्तानोतपति के उद्देश्य से आर्य लोग देव वर्ग के किसी भी पुरुष के साथ अपनी स्त्रियो को सम्भोग करने की अनुमति देते थे।

यह प्रथा इतने व्यापक रूप से प्रचलित थी कि देव लोग आर्य स्त्रयो के साथ सम्भोग करना अपना आदेशात्मक अपना अधिकार समजने लगे.

किसी भी आर्य स्त्री का उस समय तक विवाह नही हो सकता था,जब की वो संभोग के साधिकार से तथा देवो के नियंत्रण से मुक्त नही कर दी जाती।
तकनीकी भासा में इसे अवदान कहते है.

लाजहोम अनुश्ठान प्रत्येक हिन्दू विवाह में किया जाता है ,जिसका विवरण आश्वलायन गृह्य सूत्र में मिलता है।
लाजहोम देवो द्वारा आर्य स्त्री को सम्भोग के अधिकार से मुक्त किये जाने का स्मृति चिन्ह है.

लाजहोम मे अवदान एक एशा अनुष्ठान है ,जो देवो के वधु के ऊपर अधिकार के समापन की कीमत करता है।
सत्पपदी सभी हिन्दू विवाहों का सबसे अनिवार्य धर्मानुस्थान है,जिसके बिना हिन्दू विवाहों को कानूनी मान्यता नही मिलती।

सत्पपदी का देवो के सम्भोग के अधिकार से अंगभूत सबन्ध है।

सत्पपदी का अर्थ है, वर के वधु के साथ सात कदम चलना ।

यह क्यो अनिवार्य है ? इसका उत्तर यह के की यदि देव क्षतिपूर्ती से असंतुष्ट हो तो वे सातवे कदम से पहले दुल्हन पर अपना अधिकार जता सकते थे ।

सातवा फेरा लेने के देवो का अधिकार समाप्त जो जाता था और वर वधु को ले जाकर,दोनो पति और पत्नी की तरह रह सकते थे।

इसके बाद देव न कोई अड़चन डाल सकते थे और न ही कोई छेड़खानी कर सकते थे ।

पुस्तक
क्रांति तथा प्रतिक्रांति
खंड-7
प्राचीन शासन प्रणाली:आर्यो की सामाजिक स्थिति
पेज न.20 21
डॉ बी आर आंबेडकर

समाज में व्याप्त कुछ बुराइयों का उल्लेख करने के उद्देश्य से हम जुए की और ध्यान आकृष्ट कर सकते है।
आर्यो में सुरापान की तरह जुआ भी व्यापक रूप से प्रचलित था.

सभी राजा के यहाँ जुआ खेलने के लिए महल के साथ ही एक कक्ष होता था । प्रत्येक राजा जुए के लिए एक विशेषज्ञ को नौकरी पर रखता था, जो खेल में साथ देता था.

सम्राट की सेवा में कंक जैसा जुआ-विशेषज्ञ था । जुआ राजाओं का केवल मनोरंजन का साधन ही नही था ।
वे बड़े-बड़े दांव लगाकर खेलते थे।
वे राज्यो,आश्रितों, रिश्तेदारों, गुलामो आदि को दांव पर लगा देते थे.

राजा नल पुष्कर के साथ जुआ खेलते हुए अपनी हर चीज को दांव पर लगाकर हार गए. केवल उन्होंने स्वयं को और अपनी पत्नी दमयंती को दांव पर नही लगाया.
जुए में हारकर राजा नल को जंगल में जाकर एक भिखारी के रूप में रहना पड़ा।

कुछ ऐसे राजा थे जो दांव लगाने में राजा नल से भी आगे बढ़ गए थे। महाभारत के सभा पर्व से पता चलता है कि पांडव के सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने जुए में अपने छोटे भाइयो को और अपनी पत्नी द्रौपदी सहित सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
जुआ आर्यो के लिए सम्मान का प्रतिक था.

डॉ. बी.आर.अम्बेडकर-
— प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति

यह ब्राह्मणी संस्कृति (दरअसल इसे संस्कृति कहना उचित नही यह विकृति को संस्कृति बनाने का सडयंत्र मात्र है ) है जिसे आज “हिन्दुत्व” के नाम से महिमामंडित करके नौजवान बहुजनो को गुमराह किया जा रहा है.

बुद्ध ने कहा है “जानो” और “जानने” के बाद उसे अपनी तर्क बुद्धि के तराजू में तोलो फिर वे आपके लिए आपके परिवार के लिए आपके समाज और पूरी मानवता के लिए ठीक लगे,

फिर उसे मानो लेकिन बहुजन समाज में व्याप्त ब्राह्मणवाद उसे ऐसा करने में बाधा उत्पन्न करता है,
जो कहता है “जानो” नही सिर्फ “मानो” धर्म की बातों पर सवाल खड़ा करना हिंदुत्व में द्रोह है पाप है यही

अन्धविश्वास उत्पन्न करने का पहला फरमान आज तक बहुजन अपने सिर पर हजारो साल से ढोह रहे है कभी बहुजन महापुरुषों की कथनी करनी पे यकीन नही किया न उन्हें पढ़ा न उन्हें जाना,

ज्ञान प्राप्ति ही इंसान के जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए ऐसा बाबासाहब ने हमे शिखाया है और हम उनकी भक्ति में लीन होकर उन्ही के विचारो के विरुद्ध जाकर अपने लिए दुविधा की खाई खोद रहे है ।

इंद्र ने “कृष्ण” नामक असुर की सभी गर्भवती पत्नियों को मार डाला था.
वे उसकी प्रशंसा करते है, क्योंकि उसने असुरों के सैकड़ों गांवो को नष्ट कर दिया था.

वे उसकी प्रशंसा करते है, क्योंकि उसने लाखो “दस्युओं” को मार डाला था.

वे इस आशा में इंद्र की प्रार्थना करते है ताकि वे “अनार्यो” का और भी विनाश कर सके ।

जिससे वे उन (अनार्यो) की खाद्य-आपूर्ति के साधन और संपदा प्राप्त कर शके.

ऋग्वेद के सूक्त आध्यात्मिक तौर पर उन्नायक होने के बजाय, कुत्सित विचारो तथा कुत्सित प्रयोजनों से भरपूर है।

आर्य-धर्म का सरोकार कभी भी सदाचारी जीवन से नही रहा।

-डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
“प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति”

निलेष राठोड

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