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क्यों लेते हैं हिन्दू विवाह में सात फेरे ?

क्यों लेते हैं हिन्दू विवाह में सात फेरे ?
सात फेरे लेने के पीछे का सच

आर्यो में अपनी औरतो को कुछ समय के लिए भाड़े पे देने की प्रथा थी
उदाहरण के लिए माधवी का उल्लेख किया जा सकता है.
राजा ययाति ने अपने गुरु गालव को अपनी पुत्री माधवी भेट में दे दी थी.
गालव ने माधवी को तीन राजाओ अलग अलग समय के लिए भाड़े पर दे दिया.
उसके बाद उसने उसे विवाह रचाने के लिए विस्वामित्र को दे दिया.
वह पुत्र उत्पन होने तक उसके साथ रही.
उसके बाद गालव ने लड़की को वापस लेकर पुनः उसके पिता ययाति को लौटा दिया।

अस्थाई तोर पर स्त्रियो को भाड़े पर देंने की प्रथा के अलावा,आर्यो में एक अन्य प्रथा प्रचलित थी,अर्थात उनमे से सर्वोत्तम पुरुषो को सन्तानोतपति की अनुमति देना।
आर्यो में लोगो का एक वर्ग होता था,जिसे देव कहते थे,जो पद और पराक्रम में श्रेष्ठ माने जाते थे ।

अच्छी सन्तानोतपति के उद्देश्य से आर्य लोग देव वर्ग के किसी भी पुरुष के साथ अपनी स्त्रियो को सम्भोग करने की अनुमति देते थे।

यह प्रथा इतने व्यापक रूप से प्रचलित थी कि देव लोग आर्य स्त्रयो के साथ सम्भोग करना अपना आदेशात्मक अपना अधिकार समजने लगे.

किसी भी आर्य स्त्री का उस समय तक विवाह नही हो सकता था,जब की वो संभोग के साधिकार से तथा देवो के नियंत्रण से मुक्त नही कर दी जाती।
तकनीकी भासा में इसे अवदान कहते है.

लाजहोम अनुश्ठान प्रत्येक हिन्दू विवाह में किया जाता है ,जिसका विवरण आश्वलायन गृह्य सूत्र में मिलता है।
लाजहोम देवो द्वारा आर्य स्त्री को सम्भोग के अधिकार से मुक्त किये जाने का स्मृति चिन्ह है.

लाजहोम मे अवदान एक एशा अनुष्ठान है ,जो देवो के वधु के ऊपर अधिकार के समापन की कीमत करता है।
सत्पपदी सभी हिन्दू विवाहों का सबसे अनिवार्य धर्मानुस्थान है,जिसके बिना हिन्दू विवाहों को कानूनी मान्यता नही मिलती।

सत्पपदी का देवो के सम्भोग के अधिकार से अंगभूत सबन्ध है।

सत्पपदी का अर्थ है, वर के वधु के साथ सात कदम चलना ।

यह क्यो अनिवार्य है ? इसका उत्तर यह के की यदि देव क्षतिपूर्ती से असंतुष्ट हो तो वे सातवे कदम से पहले दुल्हन पर अपना अधिकार जता सकते थे ।

सातवा फेरा लेने के देवो का अधिकार समाप्त जो जाता था और वर वधु को ले जाकर,दोनो पति और पत्नी की तरह रह सकते थे।

इसके बाद देव न कोई अड़चन डाल सकते थे और न ही कोई छेड़खानी कर सकते थे ।

पुस्तक
क्रांति तथा प्रतिक्रांति
खंड-7
प्राचीन शासन प्रणाली:आर्यो की सामाजिक स्थिति
पेज न.20 21
डॉ बी आर आंबेडकर

समाज में व्याप्त कुछ बुराइयों का उल्लेख करने के उद्देश्य से हम जुए की और ध्यान आकृष्ट कर सकते है।
आर्यो में सुरापान की तरह जुआ भी व्यापक रूप से प्रचलित था.

सभी राजा के यहाँ जुआ खेलने के लिए महल के साथ ही एक कक्ष होता था । प्रत्येक राजा जुए के लिए एक विशेषज्ञ को नौकरी पर रखता था, जो खेल में साथ देता था.

सम्राट की सेवा में कंक जैसा जुआ-विशेषज्ञ था । जुआ राजाओं का केवल मनोरंजन का साधन ही नही था ।
वे बड़े-बड़े दांव लगाकर खेलते थे।
वे राज्यो,आश्रितों, रिश्तेदारों, गुलामो आदि को दांव पर लगा देते थे.

राजा नल पुष्कर के साथ जुआ खेलते हुए अपनी हर चीज को दांव पर लगाकर हार गए. केवल उन्होंने स्वयं को और अपनी पत्नी दमयंती को दांव पर नही लगाया.
जुए में हारकर राजा नल को जंगल में जाकर एक भिखारी के रूप में रहना पड़ा।

कुछ ऐसे राजा थे जो दांव लगाने में राजा नल से भी आगे बढ़ गए थे। महाभारत के सभा पर्व से पता चलता है कि पांडव के सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने जुए में अपने छोटे भाइयो को और अपनी पत्नी द्रौपदी सहित सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
जुआ आर्यो के लिए सम्मान का प्रतिक था.

डॉ. बी.आर.अम्बेडकर-
— प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति

यह ब्राह्मणी संस्कृति (दरअसल इसे संस्कृति कहना उचित नही यह विकृति को संस्कृति बनाने का सडयंत्र मात्र है ) है जिसे आज “हिन्दुत्व” के नाम से महिमामंडित करके नौजवान बहुजनो को गुमराह किया जा रहा है.

बुद्ध ने कहा है “जानो” और “जानने” के बाद उसे अपनी तर्क बुद्धि के तराजू में तोलो फिर वे आपके लिए आपके परिवार के लिए आपके समाज और पूरी मानवता के लिए ठीक लगे,

फिर उसे मानो लेकिन बहुजन समाज में व्याप्त ब्राह्मणवाद उसे ऐसा करने में बाधा उत्पन्न करता है,
जो कहता है “जानो” नही सिर्फ “मानो” धर्म की बातों पर सवाल खड़ा करना हिंदुत्व में द्रोह है पाप है यही

अन्धविश्वास उत्पन्न करने का पहला फरमान आज तक बहुजन अपने सिर पर हजारो साल से ढोह रहे है कभी बहुजन महापुरुषों की कथनी करनी पे यकीन नही किया न उन्हें पढ़ा न उन्हें जाना,

ज्ञान प्राप्ति ही इंसान के जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए ऐसा बाबासाहब ने हमे शिखाया है और हम उनकी भक्ति में लीन होकर उन्ही के विचारो के विरुद्ध जाकर अपने लिए दुविधा की खाई खोद रहे है ।

इंद्र ने “कृष्ण” नामक असुर की सभी गर्भवती पत्नियों को मार डाला था.
वे उसकी प्रशंसा करते है, क्योंकि उसने असुरों के सैकड़ों गांवो को नष्ट कर दिया था.

वे उसकी प्रशंसा करते है, क्योंकि उसने लाखो “दस्युओं” को मार डाला था.

वे इस आशा में इंद्र की प्रार्थना करते है ताकि वे “अनार्यो” का और भी विनाश कर सके ।

जिससे वे उन (अनार्यो) की खाद्य-आपूर्ति के साधन और संपदा प्राप्त कर शके.

ऋग्वेद के सूक्त आध्यात्मिक तौर पर उन्नायक होने के बजाय, कुत्सित विचारो तथा कुत्सित प्रयोजनों से भरपूर है।

आर्य-धर्म का सरोकार कभी भी सदाचारी जीवन से नही रहा।

-डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
“प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति”

निलेष राठोड

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