:::::::::मजबूर पिता:::::::::

सूरज एक शिक्षित,सजग और विवेकशील युवक है वह अपने पुत्र अरुण की बढ़ती बीमारी से अत्यधिक परेशान हैं अभी कुछ समय पहले की ही तो बात है जब सूरज की पत्नी का देहांत हुआ है और अरुण अपनी मां के प्यार से वंचित हो गया है इतनी कम उम्र में मां का प्यार न मिलने के कारण अरुण काफी उदास रहता है अब सूरज ही अपने पुत्र की देखभाल करता है लेकिन कुछ समय से अरुण को गले में जो परेशानी हो रही है उससे सूरज और भी ज्यादा परेशान है अरुण सूरज का इकलौता पुत्र है वह अरुण को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता है रोज की तरह आज सूरज जैसे ही अपनी मजदूरी से घर आता है तो देखता है कि अरुण की हालत आज कुछ ज्यादा ही खराब है यह देखकर वह अपने छोटे भाई मोहन को पड़ोस के डॉक्टर साहब को बुलाने के लिए भेज देता है और सूरज अपने मित्र सुरेंद्र के साथ अरुण की देखभाल करता है बाहर का मौसम देखकर सूरज के मन में बेचैनी होने लगती है क्योंकि आज सुबह से ही मूसलाधार बारिश और आंधी तूफान का मौसम है
तभी सूरज अपने मित्र सुरेंद्र से कहता है कि” मेरा दिल डर रहा है सुरेंद्र कहीं अपनी मां की तरह अरुण भी मुझे धोखा ना दे जाए”
तभी मोहन डॉक्टर के साथ आ जाता है डॉक्टर ने आकर अरुण की जांच की कथा कहता है कि बच्चे की हालत बहुत नाजुक है एक इंजेक्शन दे दिया है और गले में 15:15 मिनट के बाद दवाई की दो चार बूंदे डालते रहना बस यही इलाज है बाकी भगवान पर भरोसा रखो यह सुनकर सूरज पर मानो जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट गया हो तभी सूरज की मां वहां आती है और कहती है कि सियालकोट से एक बड़े व्यापारी अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आए हैं वह तुम्हें एक बार देखना चाहते हैं सूरज की मां सुरेंद्र से कहती है कि इसे समझा कर नीचे ले आओ वह लोग इसका इंतजार कर रहे हैं लेकिन सूरज को इस समय कुछ अच्छा नहीं लग रहा है वह अपने बेटे के बीमार होने से बहुत परेशान है और सूरज के मां बाप दहेज के लालच में सूरज की दूसरी शादी करना चाहते हैं लेकिन सूरज इस शादी से बिल्कुल भी सहमत नहीं है उसे तो सिर्फ अपने बेटे की चिंता है इसी समय सूरज के पिता कहते हैं कि बेटा जल्दी नीचे आ जा वे लोग सियालकोट से आए हैं और तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं बे सियालकोट के बहुत बड़े व्यापारी हैं सियालकोट में इनकी बड़ी भारी फर्म है हजारों का तो उनके यहां लेन देन होता है अपने माता-पिता की यह बातें सूरज को तीर की तरह चुभ रही है एक तो सूरज का बेटा आज बहुत अधिक बीमार है और उसके माता-पिता शगुन विवाह और शहनाई में झूम रहे हैं सूरज के पिता शगुन लेकर सूरज की मां को बधाई देते हैं उसी समय अरुण अपने असहाय पिता को छोड़कर इस दुनिया से विदा ले लेता है सूरज बड़े आक्रोश में चिल्लाता है “नाचो गाओ,ढोल बजाओ, खुशियां मनाओ “मेरा बेटा तो इस दुनिया से चला गया अब तुम खूब ढोल बजाओ खुशियों बनाओ यह देख कर सूरज का मित्र सुरेंद्र और सूरज का भाई मोहन भी रोने लगते हैं और उसके पुत्रों को अंतिम विदाई देने लगते हैं
“लालच बुरी बला है “इस कहानी से सभी पाठकों को यह सीख मिलती है कि जीवन में कभी भी किसी वस्तु का लालच नहीं करना चाहिए तथा संपूर्ण प्राणियों को एवं जीवो को महत्व देना चाहिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को धन दौलत का लालच नहीं करना चाहिए
लेखक :-दीपक कोहली
9690324907

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