भगतसिंह “स्वतंत्रता संग्राम सेनानी”

भगतसिंह “स्वतंत्रता संग्राम सेनानी”

भगतसिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह संधू जाट सिक्ख थे वे देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वह भुलाया नहीं जा सकता। इन्होंने केंद्रीय संसद (सैन्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च 1931 को इनके दो साथियों राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फांसी पर लटका दिया। सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गंभीरता से याद किया। पहले लाहौर में सांडर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में चन्द्र शेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलंदी प्रदान की। भगतसिंह को.समाजवादी, वामपंथी और मार्क्सवादी विचारधारा में रुचि थी।

 

जन्म स्थान                     गांव बावली जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)

मृत्यु स्थल                       लाहौर पंजाब (अब पाकिस्तान में)

आंदोलन                        भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

उस समय भगतसिंह करीब 12 वर्ष के थे जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगतसिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंच गए। इस उम्र में भगतसिंह अपने चाचाओं की क्रांतिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं?

1926 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शन में भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठीचार्ज भी किया। इसी लाठीचार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। अब इनसे रहा ना गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरीटेंडेंट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साईकिल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो खराब हो गई हो। गोपाल के इसारे पर दोनों सचेत हो गए। उधर चन्द्र शेखर आजाद पास के डी. ए. वी. स्कूल की चाहरदीवारी के पास बैठकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।

17 दिसम्बर 1928 को करीब सवा चार बजे ए. एस. पी. सांडर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरंत बाद वे होश खो बैठे। इसके बाद भगतसिंह ने 3-4 गोली दागकर उसके मरने का पूरा इंतजाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चमनसिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्र शेखर आजाद ने उसे सावधान किया,”आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा।” नही मानने पर आजाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन्होंने लालालाजपतराय की मौत का बदला ले लिया।

फांसी

23 मार्च 1931 को शाम के करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगतसिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और वह पूरी करने का समय दिया जाए। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने यह सूचना दी कि उनकी फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था-“ठहरिए! पहले एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल तो ले।” ठीक है अब चलो।

फांसी पर जाते समय तीनों मस्ती से गा रहे थे-

मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे

मेरा रंग दे बसंती चोला! माय रंग दे बसंती चोला।।

लेखक   चन्द्र किशोर

 

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