प्रायश्चित

प्रभात और अमन पड़ोसी बच्चे थे । दोनो में गहरी दोस्ती थी । वे साथ-साथ स्कूल जाया करते थे । अमन की दादी माँ प्रभात को भी अपने पोते अमन के बराबर ही प्यार करती थीं, क्योंकि इसका एक मुख्य कारण ये भी था कि प्रभात की माँ नहीं थी । वह उसे जन्म देकर संसार से विदा ले चुकी थी । प्रभात अपने पिता के साथ ही रहता था । उसके पिता सब्जी बेचने का काम करते थे ।
प्रभात और अमन बड़े ही शरारती बालक थे । एक दिन जब वह स्कूल से घर वापस लौट रहे थे, तो उन्हें रास्ते के पास में ही कुतिया के चार पिल्ले दिखाई पड़े , उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे चार-छः दिन पहले ही उन्होंने जन्म लिया हो । उन्होंने आँखे खोली ही थीं । दोनो दोस्त उन सुन्दर पिल्लों के साथ खेलने लगे, पिल्ले उन्हें बहुत ही प्यारे लग रहे थे ।
प्रभात ने अमन से कहा कि तू दो मिनट रुक, आज मैं तुझे एक प्रयोग करके दिखाऊँगा उसने अपना स्कूल बैग पीठ से उतार कर जमीन पर रख दिया, और पास में खड़े आक के पत्ते तोड़ लाया । उसने पिल्लों की आँखों में बार-बार से आक के दूध की दो-दो बूँदे डाल दीं ,अमन पास में खड़ा ये सब देखता रहा । उसे पता नहीं था कि प्रभात ने कितना बड़ा पाप कर दिया है । पिल्ले कू-कू कर चिल्लाने लगे, अमन ने प्रभात से पूँछा कि ये पिल्ले क्यों चिल्ला रहे हैं । प्रभात ने हँस कर कहा देखते रहो अब इनकी आँखो से इन्हें कभी दिखाई नहीं देगा । प्रभात ने बात किसी के मुख से सुनी थी, जिसको आज वह मूर्त रुप दे चुका था । पिल्ले आँख के दर्द से कराह रहे थे । अमन के हृदय में एक घबराहट सी होने लगी कि आज अवश्य ही घर पर जाकर दादी माँ की फटकार सुनने को मिलेगी । अब वह अपना बैग उठा कर अपने घर पहुँच गये ।
डर के मारे आज अमन का चेहरा दादी माँ को मुरझाया सा लग रहा था । अमन को बार-बार उन पिल्लों की याद आ रही थी । जिनकी आँखों की रोशनी छीन कर देखता वह अभी आया था । दादी माँ को अमन ने बताना ही उचित समझा, शायद दादी माँ डाट डपट के बाद कोई उपाय पिल्लों की आँखों के लिये बतायेंगी । जिससे पिल्लों की आँखों की रोशनी वापस आ जाये । अमन ने दादी माँ से सारी बाते बतायीं । दादी करे हृदय को अमन की बातों से गहरा अघात हुआ । प्रभात को भी भला-बुरा कहा कि और अमन को हिदायत दी की आज से वह प्रभात से नहीं मिलेगा, कभी बात नहीं करेगा,घर नहीं बुलायेगा, घृणा करती हूँ मैं उससे । निर्दोष पिल्लों की आँखों को फोड़ कर उसने घोर अपराध किया है । ईश्वर तो क्या मैं भी उसे कभी माफ नही करुँगी ।
दादी माँ अमन को लेकर उन पिल्लों के पास पहुँची । उन्होंने देखा कि एक पिल्ला सड़क पर बिछा पड़ा था, शायद उसे अभी कोई वाहन कुचल कर चला गया था । तीन पिल्ले वहीं पड़े चीख रहे थे । पिल्लों की दशा देख कर अमन तो रोने ही लगा । दादी माँ बार-बार प्रभात को कोस रही थी । तभी वहाँ पर एक महिला आयी और उसने बताया कि इन पिल्लों की माँ को परसो ही एक मोटरगाड़ी वाले ने कुचल दिया था ।
अमन से दादी ने घर से पिल्लों के लिए पानी व दूध लाने के लिये कहा । अमन दौड़कर घर से दूध व पानी लाया । दादी माँ ने ठीक तरह से पिल्लों की आँखों को धोखा और चम्मच से उन्हें दूध पिलाया । अब पिल्लों की आँखों का दर्द शायद कम हो गया था । सांय हो गई धान की पराल से दादी माँ ने पिल्लों के लिए छोटा सा घर बनाया और घर वापस आ गई ।
अगले दिन अमन ने दादी माँ की सारी बाते प्रभात को स्कूल में बता दीं । प्रभात तो अपने किये अपराध से पहले ही बहुत दुखी था । उसने कल से अभी तक खाना भी नहीं खाया था । जो दादी माँ अपने सगे पोते के समान उसे प्यार करती थी । वह उसका आज तिरस्कार कर चुकी थीं । अमन ने उसे अपनी दोस्ती का वास्ता दिया, स्कूल से लौटते वक्त जब वह पिल्लों की तरफ से गुजर रहे थे तो देखा इनमें से एक पिल्ला और भी ठण्ड से दम तोड़ चुका था । दोनो बच्चों की आँखों में आँसू आ रहे थे, उन्होंने एक-एक पिल्ला उठाया और उन्हें लेकर घर की ओर चल दिये । दोनो ने उन पिल्लों की बहुत सेवा की, परन्तु अमन का पिल्ला करीब एक माह में ही आँगन में बने पानी के होज में गिर कर मर गया । और प्रभात जिस पिल्ले को घर लाया था उसने बीमारी से दम तोड़ दिया ।
बीस वर्ष बीत गये अमन सरकारी महकमें में बाबू बन गया, वह अपनी दादी माँ को साथ में लेकर बनारस रहने लगा ।
दादी माँ की उम्र सत्तर वर्ष पार हो चुकी थी । उनकी आँखों का ऑपरेशन होना था । अमन डॉक्टर के पास गया । एक दिन ऑफिस में किसी ने बताया कि डॉक्टर प्रभात यहाँ के सबसे अच्छे नेत्र सर्जन हैं । आप उनसे जाकर बात कर लो, अगले दिन बताये गये पते पर अमन पहुँच गया । डॉक्टर साहब को नमस्ते कर जैसे ही अमन के सामने पहुँचा, तो उसका सर चकरा सा गया । प्रभात ने एक निगाह पड़ते ही अमन को पहचान लिया । अमन तुम यहाँ कैसे ? तुम प्रभात ! डॉक्टर प्रभात, दोनो ने लपक कर गले मिल गये । प्रभात ने दादी माँ के बारे में उत्सुकता से पूछा, अमन ने बताया कि दादी माँ की आँखें बनवाने के लिये ही आँख के डॉक्टर की खोज में था, शायद इसी कारण से सौभाग्यवश तुमसे मिलना हो गया । मैंने तो सोच लिया था कि मैं कभी भविष्य में आप से मिल सकूँ । डॉक्टर प्रभात ने अमन से दादी माँ को क्लीनिक पर लाने के लिये कहा, वह जानता था कि दादी माँ इसके लिये कभी राजी नहीं होंगी । वे तो उसके नाम से भी घृणा करती हैं । तीन दिन की दवाई की पुड़िया बाँध कर अमन को थमा दीं, और उससे रोज मिलने का वादा किया ।
तीन दिन दवाई खाने के बाद अमन ने दादी से पूछा कि आपको कुछ आराम है, हाँ बेटा मुझे बहुत फायदा है, उस डॉक्टर की दवाई से, भगवान उसका भला करे । तभी अमन बोला दादी माँ ,आज डॉक्टर साहब ने आपको क्लीनिक पर, आपकी आँखो का चैकप करने के लिये बुलाया है । दादी माँ सहर्ष तैयार हो कर डॉक्टर प्रभात के पास पहुँची ।
डॉक्टर प्रभात को देखते ही दादी माँ की कुछ स्मृति सी आँखो पर छा गई । दादी माँ कुछ बोल पाती प्रभात वे अपनी कुर्सी से उठ कर दादी माँ के पैर पकड़ लिये । दादी माँ मैं तुम्हारा प्रभात, मुझे क्षमा कर दो दादी माँ, मैंने अपराध किया था । दादी माँ मैं क्षमा के योग्य नहीं हूँ, दादी माँ ने कुछ क्षण रुक कर प्रभात को गले से लगा लिया । प्रभात ने बताया कि दादी माँ मुझसे जो अपराध अज्ञानवश पिल्लों की आँखों को फोड़कर भारी दुःख हुआ था, और मैं अपने आप से घृणा करने लगा था । मैंने उसी दिन प्रण किया था कि मैं उन पिल्लों की आँखों को तो वापस नहीं ला सका लेकिन मैं आँखो का डॉक्टर बनूँगा जिससे कि लोगो की आँखो में नई रोशनी लाऊँगा । दादी माँ के हृदय में ममता उमड़ने लगी, उन्हें पुनः प्रभात को बाहों में भरकर उसके मस्तक को चूम लिया । दादी को अब उससे कोई शिकायत शायद नहीं रह गई थी । अब प्रभात को प्रायश्चित हो चुका था ।
लेखक- जयवीर सिंह प्रवक्ता(हिन्दी)

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