कलुआ

 बहुत समय पहले की बात है, मगध राज्य मे एक राजा राज करता था। वह प्रतिदिन शहर के एक व्यक्ति से एक कहानी सुनता था । कहानी न सुनाने पर परिवार सहित मृत्यु दण्ड की सजा सुनाता था । शहर के लोग इस बात से चिंतित थे कि, न जाने कब कहानी न सुना पाने पर किस दिन राजा किसको मृत्यु दण्ड दे ,दे ।

      उसी नगर मे कलुआ नाम का एक मँदबुद्धि व्यक्ति रहता था । कलुआ के एक बीबी और दो बच्चे भी थे । कल कहानी सुनाने का नम्बर कलुआ का होगा, ये सोचकर सभी चितिंत थे । कलुआ की पत्नी ने उससे कहा कि हम रात्रि मे ही यह शहर छोड़ जायेंगे तभी हम अपने को राजा से बचा पायेंगे । ऐसा सोच कर रात्रि मे ही वे शहर से दूर निकल गए ।

     अगले दिन जब वह गर्मी होने पर किसी पेड़ की छाँव मे बैठे थे, तब कलुआ ने पास के तालाब मे गर्मी से व्याकुल एक कटरे को नहाते देखा । कलुआ ने उसे देखकर कहा- “कलुआ क्या घिस-घिस लगावे पानी, तेरे मन की मैंने जानी ।” कलुआ की पत्नी ने ये शब्द जब कलुआ के मुख से सुने तो वह उससे बोली आप जल्दी घर । वापस चलिए आपके तो कहानी याद है । आप इस कहानी को ही राजा को सुना देना -“कलुआ क्या घिस-घिस लगावे पानी, तेरे मन की मैंने जानी ।”   पत्नी के जिद करने पर कलुआ घर वापस लोट आया । दोपहर को जब राजा की सभा लगी थी ,सभी की निगाह उस पर थी । मँत्री ने आदेश दिया कि कलुआ राजा को कहानी सुनाये । कलुआ ने वही शब्द -“कलुआ क्या घिस-घिस लगावे पानी, तेरे मन की मैंने जानी ।” सुना दिये । राजा को उसके ये शब्द बहुत पसंद आये और उसे छोड़ दिया । सभी ने गहरी सांस ली, कि कलुआ की जान बच गई ।

        सभी ने राजा से छुटकारा पाने के लिए नाई से, जो राजा की हजामत करता था, कहा कि तुझे हजामत करते समय राजा की गर्दन उस्तरे से काटनी है। ऐसा न करने पर वे उसे मार देगें ।

      अगली सुबह जब कलुआ नाई राजा की हजामत कर रहा था ,उसके मन मे राजा की गरदन काटने का विचार चल रहा था कि आज वह अवश्य राजा की गरदन काट देगा । राजा को मँदबुद्धि कलुआ की सुनी कहानी याद आयी । “कलुआ क्या घिस-घिस लगावे पानी, तेरे मन की मैं ने जानी ।” राजा के मुख से अनायास निकले इन शब्दों को सुनकर कलुआ नाई के हाथ से उस्तरा छूट गया और वह राजा से बोला कि मुझे क्षमा करें ,ऐसा मैं शहर वालो के दवाब मे आकर कर रहा था । मालिक इसमेँ मेरा कोई दोष नहीं है ।

     राजा अब सब कुछ समझ चुका था । नाई को घर भेज दिया । सभा बुलाई गई , कलुआ को बुलाकर राजा ने भारी ईनाम दिया और घोषणा की गई कि आज से वह किसी से कोई कहानी नहीं सुनेगा ।

      शिक्षा- इस सँसार मे किसी को तुच्छ नहीं समझना चाहिए ।

         लेखक: जयवीर सिंह

                       (  प्रवक्ता हिन्दी)

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