ऐसे लोग जो सिर्फ खाते हैं पेड़ की जड़ और भात

आज तक भात के सिवा दूसरा कोई व्यंजन नहीं चखा, इस तरह खाते है पेड़ की जड़ों को सिझाकर (उबालके), आजतक कोई बाहरी भी नहीं गया इस गांव में, मरने से पहले ही दफनाने के लिए खोद देते हैं कब्र,
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घाटशिला(झारखंड).पूर्वी सिंहभूम के डुमरिया डिविजन हेडक्वार्टर से करीब 30 और जमशेदपुर से लगभग 60 किमी दूर एक गांव है ‘दंपाबेड़ा’। इस गांव से सटे करीब 4 हजार फीट ऊंचे पहाड़ की चोटी पर बसे हैं लुप्तप्राय आदिम जनजाति के 25 सबर परिवार। इनके गांव को जंगल ब्लाक कहते हैं। इस पहाड़ पर चार किमी के दायरे में बसे ये लोग आज भी आदिम युग की तरह जीते हैं। इनका जनजीवन सामान्य लोगों से बिल्कुल अलग है। भास्कर रिपोर्टर पांच किमी पैदल चलकर जब चोटी पर पहुंचा तो बच्चे देखकर भागने लगे।

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मरने से पहले ही गांव वाले दफनाने के लिए खोद देते हैं कब्र

सरकार की ओर से सुविधा के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। इसके लिए इन्हें किसी से कोई शिकायत भी नहीं। ये यहां से कहीं और जाना भी नहीं चाहते। इनकी अलग ही भाषा है जो बांग्ला तथा ओड़िया से मिल कर बनी है। गांव में बाहरी लोग को आना जाना नहीं है। इस गांव में अगर कोई गंभीर रूप से बीमार होता है तो उसके मरने के पूर्व ही दफनाने के लिए कब्र खोद दिया जाता है। बीमार का मरना तय है। पिछले माह ही एक माह तक बीमार रहने के बाद महिला सुरमी सबर (35) ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया था। वह रामो सबर की पत्नी थी।
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पढ़ाई क्या है, नहीं जानते यहां के बच्चे

गांव में करीब 30 से ज्यादा बच्चे है। पढ़ाई क्या होती है, इन्हें नहीं पता। इनके बाल भी यहीं पर हंसुए से काटे जाते हैं। ये बच्चे दो – दो माह तक नहाते नहीं हैं। चार हजार फीट ऊंचे पहाड़ के नीचे दंपाबेड़ा में स्कूल हैं। पहाड़ से उतरकर रोज स्कूल आना- जाना इनके लिए संभव नहीं है। कुछ लोग लकड़ी काटकर महीने में एक बार नीचे उतरते हैं और लकड़ी को हाट में बेचकर जरूरत का समान लेकर फिर ऊपर चढ़ जाते हैं।
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गांव तक जाने का कोई रास्ता नहीं
इस गांव तक जाने के लिए पहाड़ी पर कोई रास्ता नहीं। करीब पांच किलोमीटर की सीधी चढ़ाई है। जरा सी चूक हुई तो किसी पेड़ पर अटककर ही रूक सकते हैं। पत्थरों से पटे तंग इसी रास्ते से सबर अपनी मंजिल तय करते हैं।
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बूंद-बूंद गिर रहा झरने का पानी अमृत के समान

पहाड़ी पर ही बूंद बूंद गिर रहे झरना के पानी से गांव वालों का भोजन बनता है और इनकी प्यास बुझता है। यह झरना इनके लिए अमृत के समान है। गांव से दो किमी की दूरी पर यह झरना है। इनका घर लकड़ी का घेरा तथा मिट्टी का लेप बना होता है। इसी घर में वे गर्मी, बारिश तथा ठंड झेलते हैं। किसी भी घर में दरवाजा नहीं है।
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100 साल से ज्यादा समय से पहाड़ पर रह रहे सबर
सबर परिवार 100 साल से ज्यादा समय से यहां रहते आ रहे हैं। किसी ने इनकी अब तक खोज खबर नहीं ली है। अब तक कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी यहां नहीं पहुंचा है। माह में एक बार पहाड़ से उतरकर 12 किमी दूर बोमरो पैदल जाकर अनाज लाते हैं। अनाज खत्म होने पर कंद मूल को पकाकर खाते हैं। इन्होंने आज तक भात के सिवा के दूसरा कोई व्यंजन चखा तक नहीं है। केंदुआ पंचायत के युवा मुखिया जामुन सोय ने बताया कि जंगल ब्लॉक गांव में चार टोले है। चामरुगोड़ा, दंपाबेडा, कीताकोचा तथा पांडुसाई।
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सौजन्य : दैनिक भास्कर

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