:::::::::::::अंत सच्ची मित्रता का:::::::::::::

बहुत समय पहले एक जंगल में एक खरगोश रहता था जंगल में खरगोश की मित्रता एक बैल और घोड़े से थी लेकिन खरगोश ने कभी उनकी मित्रता को परखा नहीं था वह उन्हें हमेशा अपना सच्चा मित्र समझता था एक बार खरगोश जंगल में घूम रहा था तभी कुछ शिकारी कुत्ते खरगोश के पीछे पड़ जाते हैं यह देखकर खरगोश वहां से भागने लगता है और वह भागते-भागते लगभग आधे जंगल को पार कर जाता है अब खरगोश के मन में एक ही विचार आ रहा था कि कहीं उसके मित्र मिल जाएं और उसकी जान शिकारी कुत्तों से बचा ले खरगोश के मन में यही विचार चल रहे थे और वह भागते-भागते थक चुका था साथ ही साथ खरगोश का दम भी फूल गया था खरगोश को लग रहा था कि वह अब ज्यादा दूर नहीं भाग सकता कुछ दूर चलने के पश्चात खरगोश को एक झाड़ी दिखाई देती है खरगोश ने सोचा क्यों न कुछ समय इस झाड़ी में छुपकर व्यतीत कर लिया जाए और शायद शिकारी कुत्ते वापस लौट जाएं लेकिन शिकारी कुत्ते अभी खरगोश के पीछे भाग रहे थे खरगोश झाड़ी में छुप जाता है और सोचता है कि उसका कोई मित्र वहां आ जाए और उसकी सहायता कर दे खरगोश सोच ही रहा था कि तभी खरगोश का मित्र घोड़ा उधर से निकलता है खरगोश यह देख कर घोड़े को अपनी संपूर्ण आपबीती बताता है और कहता है यदि मित्र तुम मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर यहां से ले जाओ तो मेरी जान बच सकती है लेकिन घोड़ा समय का अभाव बता कर वहां से चला जाता है यह देखकर खरगोश को आज अपनी मित्रता पर काफी पछतावा होता है और वह सोच ही रहा था कि उसका मित्र बेल उधर से निकलता है खरगोश घोड़े के भाति बैल को भी अपनी सारी कहानी बताता है और कहता है कि मित्र यदि तुम मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर यहां से ले जाओ तो मेरी जान बच सकती है लेकिन बैल अपनी पीठ में दर्द का बहाना लेकर वहां से चला जाता है यह देखकर खरगोश बार-बार पछताने लगता है कि यदि आज किसी सच्चे मित्र से मित्रता की होती तो यह दिन नहीं देखना पड़ता खरगोश अब अपने आप से घृणा महसूस कर रहा था और सोच रहा था कि तेरी जिंदगी का आखरी दिन है खरगोश यह सोच ही रहा था कि तभी शिकारी कुत्ते वहां पहुंच जाते हैं और खरगोश को मौत के घाट उतार देते हैं
दोस्तों यदि खरगोश ने समय रहते अपने दोस्तों को परख लिया होता तो खरगोश को अपनी जान से हाथ नहीं धोने पड़ते
“”दोस्तों अपनी जिंदगी में अपने सच्चे मित्रों को समय रहते परख लेना चाहिए कि वह मुसीबत के समय में हमारी सहायता कर सकते हैं या नहीं !””

लेखक :-दीपक कोहली
( 9690324907)

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